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मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

अहंकार - शमन

अहंकार - शमन 
एक बार एक पढ़े - लिखे व्यक्ति नदी पार कार रहे थे । उन्होंने नाविक से पूछा -' तुम्हें व्याकरण  जानते हो ?'  नाविक ने उत्तर दिया -' नहीं । ' नाव सवार व्यक्ति ने कहा -' तुम्हारी  चार आने की जिंदगी बेकार है। ' थोड़ी देर बाद उस व्यक्ति ने दोबारा उस नाविक से पूछा कि -' क्या तुम्हें काव्य करना आता  है ? ' नाविक ने कहा
 ' नहीं। '   ' फिर तो तुम्हारी आठ आना भर की जिंदगी बेकार हो गई है । 'व्यक्ति ने नाविक से कूछ  देर बाद फिर कहा -'अच्छा तुम्हें गणित तो आता होगा ?'नाविक बोला -'नहीं ! मुझे तो गणित भी नहीं आता ।'व्यक्ति ने नाविक से कहा - ' तब तो तुम्हारी बारह आने जिंदगी व्यर्थ हो गई । '
उसी समय संयोगवश नदी में तूफ़ान उठा और नाव डगमगाने लगी ।नाविक नदी में कूद गया और तैरते हुए उसने उस व्यक्ति से पूछा कि - ' बाबूजी ! तैरना तो आप जानते ही होंगे ?' बाबूजी बोले -'नहीं। 'नाविक ने कहा 
'फिर तो आपकी जिंदगी इस समय सोलह आना पानी में है । '

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

उपनिषद् साहित्य

उपनिषद् साहित्य -
विषय की दृष्टि से वेदों के तीन भाग हैं जो कि तीन काण्ड कहलाते हैं -
१. कर्मकाण्ड
२. उपासना काण्ड
३. ज्ञानकाण्ड ।
उपनिषद् वेद का ज्ञानकाण्ड हैं । वेदों का अंतिम भाग होने की कारण इन्हें वेदान्त भी कहा जाता है । उपनिषदों में ही वेद का सर्वोत्कृष्ट  सारतत्व और प्रधान लक्ष्य निहित है । मानव जीवन का लक्ष्य पारमार्थिक सत्य का ज्ञान प्राप्त करना है ,जिसके लिए उपनिषद् प्रमाण ग्रन्थ हैं । उपनिषद् वैदिक वाङ्मय के अंतर्गत  ब्रह्मयज्ञ के प्रतिपादक ग्रन्थ हैं । उपनिषद् हमारे लिए उस आध्यात्मिक प्रकाश का साधन हैं ,जिससे परम सत्य का स्वरूप उद्घाटित होता है ,मानव का मन निर्मल होता है । उपनिषदों के विषय बहुत गूढ़ ,जनसाधारण की समझ से परे और अनेक शंकाओं को उत्पन्न करने वाला है । उपनिषदों का ज्ञान रहस्यमय और गुह्य है ।
उपनिषद् नाम  -
उपनिषद् नाम के निर्वचन उसके मूल स्वरूप एवं विषय के सम्यक् अभिव्यञ्जक हैं । उपनिषद् शब्द उप (निकट )और नि (नीचे )उपसर्गपूर्वक सद् (बैठना )धातु में क्विप् प्रत्यय लगाने से सिद्ध होता है । इसका अर्थ है -गुरु के समीप रहस्य ज्ञान की प्राप्ति की लिए नीचे बैठना । तात्पर्य यह है कि उपनिषद् वह विद्या है जो योग्य अन्तेवासी शिष्य द्वारा गुरु के अत्यंत निकट नीचे बैठकर प्राप्त की जाती है क्योंकि वह अत्यंत गुप्त और गूढ़ है । उपनिषद् भाष्यकार आद्य शंकराचार्य के अनुसार उपनिषद् शब्द उप और नि उपसर्ग पूर्वक सद्(विशरण ,गति और अवसादन )धातु में क्विप् प्रत्यय लगकर निष्पन्न हुआ है ,और इसका शाब्दिक अर्थ है ब्रह्मविद्या जो  परिशीलन द्वारा मुमुक्षुजनों की संसारबीजभूता अविद्या का विनाश (विशरण ) करती है ,जो उन्हें ब्रह्म के पास पहुँचा देती है ,और जो उनके पुनर्जन्म करने वाले कर्मों तथा गर्भवास आदि दुःखों को सर्वथा शिथिल कर देती है ।
सयाण लिखते हैं -
वेदान्तोपनिषद् वाक्यानि । 
वेदान्तसार में कहा है -
वेदनतोनामोपनिषद् प्रमाणम् । 
अथर्ववेद में १९.१४. १ में 'उपनिषेदुः'  शब्द  आता है तथा ऋग्वेद ९. ११. ६ में  ' नमसा उपसीदत ' इन पदों के दर्शन से उपनिषदों की वैदिकता स्वयं सिद्ध है । सामान्यतः वैदिक साहित्य नाम से वेद,आरण्यक ,ब्राह्मण
और उपनिषद् का ही स्मरण होता है । उपनिषदों की वैदिकता के सम्बन्ध में वानप्रस्थ प्रकरण में मनु महाराज कहते हैं - 
एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षा विप्रोवने वसन् । 
विविधाश्चौपनिषदीरात्मंससिद्धये  श्रुतीः ॥ मनु.६ . २८  
 उपनिषदों में कहा गया है कि यह ज्ञान पुत्र और शिष्य से भिन्न किसी को नहीं दिया जाना चाहिए ।
तमेतं नापुत्राय वाऽनन्तेवासिने वा ब्रूयात् । 
कीथ के शब्दों में ''उपनिषद् शब्द जब किसी ग्रन्थ के लिए प्रयुक्त होता है ,तब सामन्यतया इस बात का बोध कराता है कि यह मुख्यतया विश्व एवं आत्मा अथवा ब्रह्म से सम्बद्ध संवाद को प्रस्तुत करता है ।''
ए. बी.कीथ,वैदिक धर्म एवं दर्शन पृ.६१२
उपनिषदों की संख्या -
उपनिषद् साहित्य बहुत विशाल है क्योंकि यह बहुत बाद तक विकसित होता रहा है । इनकी संख्या विद्वजनों में मतभेद का विषय है । मुक्तिकोपनिषद् में कहा गया है की १०८ उपनिषदों के अध्ययन से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है -
सर्वोपनिषदां मध्ये सारमष्टोत्तरं शतम् । 
सकृच्छ्रवणमात्रेण सर्वाधौधनिकृन्तनम् ॥ मुक्तिकोपनिषद् १. ३०. ३९ 
प्रमुख उपनिषद् -
मुख्य रूप से दस उपनिषद् सर्वाधिक प्राचीन और प्रामाणिक माने जाते हैं । आचार्य शङ्कर ने इन दसों उपनिषदों पर अपना भाष्य लिखा है -
  ईशकेनकठप्रश्नमुण्डमाण्डूक्यतित्तिरिः ।
ऐतरेयं च छान्दोग्यं बृहदारण्यकम् तथा ॥ (मुक्तिकोपनिषद् १. ३०)
ये ही उपनिषद् प्राचीन तथा प्रामाणिक माने जाते हैं । इनके अतिरिक्त कौषीतकि उपनिषद् ,श्वेताश्वतर उपनिषद् ,तथा मैत्रायणीय उपनिषद् भी प्राचीन स्वीकृत हैं । आचार्य शङ्कर ने ब्रह्म सूत्र भाष्य में दशोपनिषद् के साथ प्रथम दोनों को भी उद्धृत किया है ,किन्तु उन्होनें इन पर भाष्य की रचना नहीं की है । श्वेताश्वतर उपनिषद् पर जो शांकर भाष्य है ,वह आदि शंकराचार्य का नहीं है । इस प्रकार ये ही तेरह उपनिषदें वेदांत तत्व की प्रतिपादिका होने से विशेष श्रद्धेय हैं ।  

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

गणेश वन्दना एवं पूजन विधि

ॐ सिद्धि बुद्धिसहिताय,श्रीमन्महागणाधिपतये नमः ।
गणेश वन्दना एवं पूजन विधि 
गणेश चतुर्थी 
भाद्रपद माह की शुक्लपक्ष की चतुर्थी गणेश चतुर्थी के नाम से प्रसिद्ध  है। इस दिन स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर गणेश भगवान का पूजन अर्चन करना चाहिए । मोदक,लड्डू तथा हरे दूर्वा श्रद्धापूर्वक ईश्वर को अर्पित करने चाहिए  ।महाप्रभु के निम्नोक्त नामों का प्रतिदिन तीन बार पाठ करने से शुभकार्यों में कोई विघ्न नहीं आता । -
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् |
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुः कामार्थसिद्धये ||
प्रथमं वक्रतुण्डं च ,एकदन्तं द्वितीयकम् |
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षम् ,गजवक्त्रं चतुर्थकम् ||
लंबोदरं पञ्चमं च ,षष्ठं विकटमेव च |
सप्तमं विघ्नराजं च ,धूमवर्णं तथाष्टकम् ||
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्|
एकादशं गणपतिम्  ,द्वादशं तु गजाननम् ||
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्घ्यं यः पठेन्नरः |
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम् ||

 गणेश महामंत्र -ॐ गं गणपतये नमः ।
ॐ एकदन्तायविद्म्हे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।
ॐ वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
अर्थात टेढ़ी सूंड वाले ,विशालकाय शरीरवाले ,करोड़ों सूर्यों के प्रकाशतुल्य प्रकाशवाले गणेश भगवान् मेरे सभी कार्यों को विघ्नरहित करें ।

गजाननं भूतगणाधिसेवितम् ,कपित्थ-जम्बू-फल-चारु-भक्षणम् |
उमासुतं शोक-विनाश-कारकम् ,नमामि विघ्नेश्वर-पाद-पङ्कजम् ||
अर्थात भूतगणों के द्वारा सेवित ,कैथ और जामुन के फलों के सार को खाने वाले,(भक्तों के)शोक नाश का कारण बनाने वाले पार्वती के पुत्र ,विघ्नों के स्वामी गजानन के चरणकमलों को मैं नमस्कार करता हूँ ।
श्री गणेश भगवान् की कथा 
एक बार भगवान शङ्कर स्नान करने के लिए भोगवती नामक स्थान पर गए । उनके चले जाने के पश्चात पार्वती ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया । जिसका नाम उन्होंने गणेश रखा पार्वती ने गणेश को द्वार पर एक मुद्गल लेकर बैठाया और कहा कि जब तक मैं स्नान करूँ तब तक किसी भी पुरुष को अंदर मत आने देना ।
भोगवती पर स्नान करने के बाद जब भगवान् शङ्कर आये तो गणेश ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया । क्रुद्ध होकर भगवान् शङ्कर ने श्रीगणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया और अंदर चले गए । पार्वती ने समझा की भोजन में विलम्ब होने के कारण शिव शङ्कर नाराज हैं । उन्होंने उसी समय दो थालियों में भोजन परोसकर शिव शङ्कर को बुलाया । शिव शंकर ने दो थाल देखकर पूछा -दूसरा किसके लिए है । पार्वतीजी बोली-दूसरा थाल पुत्र गणेश के लिए है ,जो बाहर पहरा दे रहा है । यह सुनकर शिवशङ्कर ने कहा , '' मैंने तो उसका सिर काट दिया । ''यह सुनकर पार्वती बहुत दुःखी हुई और पुत्र गणेश को पुनः जीवित करने की प्रार्थना करने लगी । शिवशंकर ने तुरंत ही पैदा हुए हाथी के बच्चे का सिर बालक के धड़ से जोड़ दिया । तब पार्वती  ने प्रसन्नता पूर्वक  पति और पुत्र को भोजन कराकर स्वयं भोजन किया । यह घटना भाद्रपद शुक्ल`चतुर्थी को हुई थी इसी लिए इसका नाम गणेश चतुर्थी पड़ा ।
श्री गणेश चालीसा 
दोहा -एकदन्त शुभ गजवदन,विघ्न विनाशक नाम ।
श्री गणेश सिद्धि सदन , गणनायक सुखधाम ॥
मंगल मूर्ति महान श्री ,ऋद्धि सिद्धि दातार ।
सब देवन में आपको ,प्रथम पूज्य अधिकार ॥
चौपाई 
वक्रतुंड श्री सिद्धि विनायक । जय गणेश सुख सम्पति दायक ॥
गिरिजा नंदन सब गुण  सागर । भक्त जनों के भाग्य उजागर ॥
श्री गणेश गणपति सुखदाता । सम्पति ,सुत सौभाग्य प्रदाता  ॥
राम नाम में दृढ़ विश्वासा । श्रीमन नारायण प्रिय दासा ॥
मोदक प्रिय मूषक है वाहन । स्मरण मात्र सब विघ्न नशावन ॥
 लम्बोदर पीताम्बर    धारी । भाल त्रिपुन्ड्र सुशोभित भारी ॥
मुक्ता पुष्प माल गल शोभित । महाकाय भक्तन मन मोहित ॥
सुखकर्ता ,दुःखहर्ता देवा । सदा करे संतन जन सेवा ॥
शरणागत रक्षक गणनायक । भक्तजनों के सदा सहायक ॥
सकल शास्त्र सब विद्या ज्ञाता । धर्म प्रवक्ता जग विख्याता ॥
'महाभारत ' श्री व्यास बनाया । तब लेखन हित  तुम्हे बुलाया ॥
शुभ कार्यों में सब नर नारी । प्रथम वंदना करें तुम्हारी ॥
मिट जातीं बाधाएँ सारी  । तुम हो सकल सिद्धि अधिकारी ॥
श्री गणेश के जो गुण गावें । उनके कार्य सफल हो जावे ॥
जो श्रद्धा से करे प्रार्थना  । उनकी होती सिद्ध कामना ॥
श्री गणेश के जो गुण गाते ।वे जन सकल पदारथ पाते ॥
जय गणेश जय गणपति देवा । तीन लोक करते तब सेवा ॥
मास  भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी । श्री गणनायक प्रकट जयन्ती ॥
श्रद्धा से सब भक्त मनाते । दिव्यचरित महिमा यश गाते ॥
श्री गणेश निज भक्त सहायक । विघ्न विनाशक मंगल दायक ॥
रणथम्भोर दुर्ग गणनायक । महाराष्ट्र  के अष्ट विनायक ॥
वेद पुराण शास्त्र यश गावे । श्री गणेश सब  प्रथम मनावें॥
विघ्नेश्वर श्री सुरप्रिय स्वामी  ।भक्त करें जाया गान स्मरामि ॥
सर्वाभीष्ट सिद्धि फल दायक । मोदक प्रिया गणपति गणनायक ॥
भालचंद्र गजमुख सुखकारी । पहले पूजा होत  तुम्हारी ॥
भक्त जनों को शुभ वरदायक। श्री गणेश जय वरद विनायक॥
श्री गणेश महिमा अति भारी ।इससे परिचित सब नर नारी ॥
गणपति की महिमा सब गाते ।रिद्धि सिद्धि यश वैभव पाते ॥
संकट में जो गणपति ध्यावें । उनके सर्व कष्ट कट जावें ॥
ऋद्धि सिद्धि बुद्धि बल दायक ।सदा सर्वदा विजय प्रदायक ॥
वृन्दावन के सिद्धि विनायक । श्री गणेश गणपति गणनायक ॥
विघ्न विनाशक नाम तुम्हारा । करो सिद्ध सब कार्य हमारा ॥
सब पर कृपा सदा प्रभु करना । दुःख दारिद्र्य शोक सब हरना॥
श्री मंगल विग्रह सुखकारी ।विनय करो स्वीकार हमारी ॥
पत्र पुष्प फल जल लेकर मै । पूजा करे सदा हम घर में ॥
जो यह पठन करे सौ बारा  । उन पर गणपति कृपा अपारा ॥
एक पाठ भी जो नित करते । उनकी सब विपदाएँ हरते ॥
रोग शोक बंधन कट जाते । सुख सम्पति संतति यश पाते ॥
शुभ मंगल सुन्दर फल पावे । श्री गणेश चालीसा गावे ॥
सफल गजानन करे कामना । भक्त गदाधर रचित प्रार्थना॥
दोहा - श्री गणेश गणपति प्रभो ! गणनायक गणराज।
 करो सफल मम कामना ,विघ्नेश्वर महाराज ॥

श्री गणेश भगवान की आरती 
जय -गणेश  ,जय -गणेश , जय -गणेश  देवा।
माता जाकी पार्वती ,पिता महादेवा ॥ जय -गणेश  ......
पान-चढ़े ,फूल चढ़े और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें  सेवा ॥ जय -गणेश  ......
एक दन्त दयावन्त,चार भुजा धारी ।
मस्तक सिंदूर  सोहे। मूषक की सवारी ॥ जय -गणेश  .....
अंधन को आँख देत ,कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत , निर्धन को माया ॥ जय -गणेश  ....
सूर्य श्याम शरण आएं सफल कीजै सेवा॥ जय -गणेश। ..
दीनन की लाज राखो ,बंधु सुतवारी ।
कामना को पूर्ण करो ,जग बलिहारी ॥ जय -गणेश  ...
  जय -गणेश  ,जय -गणेश , जय -गणेश  देवा ॥
॥ बोलो गणेश भगवान की जय ॥
 ॥ चिंतामन गणेश की जय ॥


शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

श्रीदुर्गासप्तशती shriDurgashaptasati,

श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम्स्त्रोतम्
शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने |
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गाप्रीता भवेत् सती ||
ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचिनी |
आर्या दुर्गा जया चाद्यात्रिनेत्रा शूलधारिणी ||
पिनाकधारिणी चित्रा   चण्डघण्टा   महातपाः |
मनो बुद्धिरहङ्कारा चित्तरूपा चिता   चितिः ||
सर्वमन्त्रमयी    सत्ता   सत्यानन्दस्वरुपिणी |
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः ||
शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा |
सर्वविद्या    दक्षकन्या       दक्षाविनाशिनी ||
अपर्णानेकवर्णा   च   पाटला   पाटलावती |
पट्टाम्बरपरिधाना     कलमञ्जीररञ्जिनी ||
अमेयविक्रमा  क्रूरा   सुन्दरी     सुरसुन्दरी |
वनदुर्गा  च  मातङ्गी  मतङ्गमुनिपूजिता ||
 ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा |
चामुण्डा  चैव   वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः ||
विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा |
बहुला          बहुलप्रेमा          सर्ववाहनवाहना  ||
निशुम्भशुम्भहननी             महिषासुरमर्दिनी |
मधुकैटभहन्त्री       च        चण्डमुण्डविनाशिनी ||
सर्वासुरविनाशा          च       सर्वदानवघातिनी |
सर्वशास्त्रमयी सत्या   सर्वास्त्रधारिणी    तथा ||
अनेकशस्त्रहस्ता  च  अनेकास्त्रस्य   धारिणी |
कुमारी चैककन्या  च   कैशोरी  युवती   यतिः ||
अप्रौढा    चैव    प्रौढा    च   वृद्धमाता    बलप्रदा |
महोदरी     मुक्तकेशी      घोररूपा     महाबला ||
अग्निज्वाला    रौद्रमुखी    कालरात्रितपस्विनी |
नारायणी    भद्रकाली   विष्णुमाया    जलोदरी ||
शिवदूती    कराली    च    अनन्ता   परमेश्वरी |
कात्यायिनी च  सावित्री   प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी ||
य    इदं    प्रपठेन्नित्यं     दुर्गानामशताष्टकम् |
नासाध्यं  विद्यते  देवि  त्रिषु लोकेषु   पार्वति ||
धनं   धान्यं  सुतं    जायां   हयं  हस्तिनमेव  च |
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम् ||
कुमारीं पूजयित्वा  तु  ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम् |
पूजयेत्   परया   भक्त्या   पठेन्नामशताष्टकं ||
तस्य   सिद्धिर्भवेद्   देवि    सर्वेः     सुरवरैरपि |
राजानो दासतां  यान्ति  राज्यश्रियमवाप्नुयात् ||
गोरोचनालक्तककुङ्कुमेन
                                 सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण   ||
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो
                               भवेत् सदा धारयते पुरारिः ||
भौमावास्यानिशामग्रे    चन्द्रे   शतभिषां    गते|
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां  पदम् ||
इति श्रीविश्वसारतन्त्रेदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं  समाप्तम् ||
नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनायें |
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी |
तृतीयं चन्द्रघण्तेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ||
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च |
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ||
नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गा प्रकीर्तिताः ||
मां अम्बे की आरती
ओ अम्बे तू है जगदम्बे काली , जय दुर्गे खप्पर वाली , तेरे ही गुण गायें भारती ,
ओ मइया हम सब उतारें तेरी आरती | अम्बे..........
तेरे जगत के भक्त जनों पर भीड. पडी है भारी मां , भीड. पडी है भारी ,
दानव दल पर टूट पडो मां -2 करके सिंह सवारी ,
सौ - सौ सिंहों से तू बलशाली ,अष्ट भुजाओं वाली , दुष्टों को तू ही ललकारती |
ओ मइया हम सब उतारें तेरी आरती | अम्बे..........
नहीं मांगते धन और दौलत ना चान्दी ना सोना मां , ना चान्दी ना सोना,
हम तो मांगें मां तेरे मन में -2 एक छोटा सा कोना ,
सबकी बिगडी बनाने वाली ,लाज बचाने वाली ,सतियों के सत को संवारती |
ओ मइया हम सब उतारें तेरी आरती | अम्बे..........
मां बेटे का है इस जग में बडा ही निर्मल नाता मां , बडा ही निर्मल नाता ,
पूत कापूत सुने हैं पर ना -2 माता सुने कुमाता ,
सबपे करुणा बरसाने वाली , अमृत बरसाने वाली ,नइया भंवर से उबारती |
ओ मइया हम सब उतारें तेरी आरती | अम्बे..........
चरण - शरण में खडे हुए हैं ले पूजा की थाली मां , ले पूजा की थाली,
मानवाञ्छित फल देदो माता -2 जाये ना कोई खाली ,
सबके कष्ट मिटाने वाली , झोली भर देने वाली ,दुखियों के दुःख को निवारती |
ओ मइया हम सब उतारें तेरी आरती | अम्बे..........
बोलो अम्बे मात की जय |

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

उपनिषद् - ईशावास्योपनिषद्

ईशावास्योपनिषद
यह ईशावास्योपनिषद्  शुक्लयजुर्वेद  काण्वशाखीय संहिता का चालीसवाँ अध्याय है । मंत्र-भाग
 अंश होने से इसका विशेष महत्त्व है । यह  सबसे पहला उपनिषद्  है । शुक्लयजुर्वेद के  प्रथम
 उनतालीस अध्यायों में कर्मकाण्ड का निरूपण हुआ है यह उस काण्ड का सबसे अंतिम अध्याय है
 और इसमे ईश्वरतत्त्वरूप ज्ञानकाण्ड का निरूपण किया गया है ।  मंत्र में "ईशा -वास्यम्" वाक्य
 आने से इसका नाम "ईशावास्य" माना गया ।
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते |
पूर्णस्य पूर्णमादाय पुर्नमेवावशिष्यते ||
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
अर्थ-वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है ।क्यूंकि पूर्ण से
ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण है , इसलिए भी वह
परिपूर्ण है । उस पूर्ण ब्रह्मा में से पूर्ण को निकाल लेने पर भी वह पूर्ण ही बचा रहता है ।
त्रिविध ताप  की शांति हो ।

ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ १ ॥
अर्थ -मनुष्यों के प्रति वेद के पवित्र आदेश हैं की इस जगत में जो कुछ भी स्थावर -जङ्गम है ,वह
 सब ईश्वर के द्वारा आच्छादनीय है अर्थात उसे भगवत्स्वरूप ही अनुभव करना चाहिए । उसके
त्याग भाव से तू अपना पालन कर ,अर्थात सब कुछ ईश्वर का है यह समझकर केवल कर्त्तव्य
पालन के लिए ही विषयों का यथाविधि उपभोग करो ।

 कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरा ॥ २॥
अर्थ -इस लोक में शास्त्र नियत कर्त्तव्य कर्मों को करते  हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करें ।
इस प्रकार मनुष्यत्व का अभिमान रखने वाले तेरे लिए कर्म बंधन से मुक्त होने का इसके सिवा
और कोई मार्ग नहीं है । जिससे तुझे (अशुभ)कर्म का लेप ना हो ।

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।
 ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥३॥
अर्थ - मानव शरीर अन्य सभी शरीरों से श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एवं वह जीव को भगवान की
विशेष कृपा से जन्म - मृत्युरूप संसार-समुद्र से तरने के लिए ही मिलता है । ऐसे जीवन को पाकर
भी जो मनुष्य केवल विषयों की प्राप्ति और उनके उपभोग में ही में लगे हुए हैं ,वे अपना ही पतन
 कर रहे हैं । वे न केवल अपने जीवन को व्यर्थ खो रहे हैं बल्कि अपने  को और भी अधिक कर्म
बंधन में जकड़ रहे हैं । इन काम -भोग-परायण लोगों को चाहे वे कोई भी क्यों ना हों ,उन्हें चाहें
संसार  में कितने ही विशाल नाम ,यश ,वैभव या अधिकार प्राप्त हों मरने के बाद कर्मों के
फलस्वरूप बार -बार उन कूकर -शूकर ,कीट ,पतंगादि विभिन्न शोक -संतापपूर्ण आसुरी योनियों
में और भयानक नरकों में भटकना पड़ता है । इसीलिए गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि  मनुष्य को
 अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए ,अपना पतन नहीं करना चाहिए (६/५) ॥

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥४ ॥
अर्थ -  वो परमेश्वर एक अचल और एक ही है ,वह मन से भी अधिक तीव्र वेग युक्त है । जहाँ तक मन की गति है ,वे उससे भी कहीं आगे पहले से ही विद्यमान हैं । मन तो वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाता है । वे सबके आदि  और ज्ञानस्वरूप हैं ।पर उनको तो देवता तथा महर्षि भी पूर्ण रूप से जान नहीं  सकते (गीता १०. १२)जितने भी तीव्र
वेग युक्त बुद्धि ,मन और इन्द्रियाँ अथवा वायु आदि देवता हैं ,अपनी शक्ति भर परमेश्वर के अनुसंधान में दौड़ लगाते रहते हैं ;परन्तु परमेश्वर नित्य अचल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं । वे सब वहाँ तक पहुँच ही नहीं पाते ।असीम की सीमा का पता ससीम को कैसे लग सकता है।बल्कि वायु आदि देवताओं में जो शक्ति है ,जिसके द्वारा वह जलवर्षण ,प्रकाशन ,प्राणिप्राणधारण आदि कर्म करने में समर्थ होते हैं वह इन अचिन्त्य शक्ति परमेश्वर की शक्ति का एक अंश मात्र ही है । उनका सहयोग मिले बिना ये सब कुछ भी नहीं कर सकते ॥


सोमवार, 28 सितंबर 2015

स्त्रियों की क्षमता का उचित प्रयोग

क्या स्त्रियों की क्षमता का उचित प्रयोग होता है ?

एक स्वस्थ,शिक्षित ,सक्षम ,और कुशल स्त्री सभी क्षेत्रों में अपने आपको साबित कर ही लेती है और समाज में यही उसका सबसे बड़ा योगदान है । पारिवारिक ,सामाजिक,राजनैतिक या आर्थिक कोई भी कार्य हो स्त्री अपनी कुशलता से इन सबमें सामंजस्य बना ही लेती है । वहीं यदि वह चूल्हे ,चौके तक सिमित रह गई और उसके आत्मविश्वास को बढ़ाने में अपनों ने उसका सहयोग न किया तो समाज के विकास में बहुत हानि
होगी ।समाज में पुरुष  के साथ कंधे  कंधा मिलाकर  चलने के लिए अगर स्त्री का साथ मिल जाए तो  चक्र दुगनी गति  से घूमने लगेगा ।
वैसे तो ये सब कहने में और सुनने में बहुत अच्छा लगता है परन्तु अभी भी हम उस स्थिति से बहुत अधिक दूर है । स्त्री की वर्तमान स्थिति दयनीय भी है और दुर्भाग्यपूर्ण भी । आज आधी आबादी स्त्रियों की है , सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र उनका है , करीब ४० करोड़ मतदाताओं का वोट बैंक है । आज स्त्रियों को समानता का अधिकार मिले हुए छः दशक बीत चुके हैं । बावजूद इन सबके स्त्रियों को आज भी असमानता और अन्याय से मुकाबला करना पड़ता है ।  कई  सारे बंधनों से स्त्री का शरीर और मन जकड़ा हुआ है और विडम्बना देखिये कि  आज भी इस अनीति को बदलने की जगह उसे स्वाभाविक माना जा  रहा है । इस स्थिति को बदलने के लिए किसी भी वर्ग में कुछ ख़ास उत्सुकता नहीं दिखाई देती । इतने महत्त्व पूर्ण पक्ष को भी किसी ना किसी स्वार्थ की आड़ में अनदेखा किया जा रहा है ।
 यहाँ पर यह बिलकुल भी नहीं कहा जा रहा है की स्त्रियों को प्रगतिशील बनाने के लिए नौकरी और व्यवसाय जैसे कार्य करने ही चाहिए ,किन्तु उन्हें हर तरह से स्वावलम्बी बनने देने में कोई प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए । परम्परा और रूढ़ियों के नाम पर उन्हें घर के पिंजरे में कैद कर देना ,उचित नहीं है । मध्यकालीन युग के कुछ सौ वर्षों के अंधकार युग को छोड़कर भारतीय समाज में स्त्री कभी भी प्रतिबंधित नहीं रही है । स्त्री का वर्तमान पिछड़ापन स्वाभाविक नहीं है बल्कि थोपा हुआ है ।
आज स्त्री को स्वयं आवाज उठानी होगी ,उसे अपने लिए खुद लड़ना होगा और उसके लिए उसे अवसर तभी मिलेंगे जब घर के कामों को करने में घर के सभी लोग सहयोग दें । घर के काम लगते तो बहुत छोटे और थोड़े से हैं परन्तु बहुत होते है । उन्हें ख़त्म करने में स्त्री को २४ घंटे भी काम ही जान पड़ते हैं कभी तो यह लगने लगता है की यदि रात्रि न होती तो स्त्री के काम भी २४ घंटे चलते ही रहते । अच्छा यही रहता है कि सभी को थोड़े - थोड़े कार्यों को मिल बाँट कर हँसते - हँसाते समाप्त करवाना चाहिए ।एक साथ काम करना और एक साथ भोजन करना कितना उत्साहवर्धक होता है इसका अनुभव आपको अवश्य ही करना चाहिए । वैसे तो यह बहुत ही छोटा सा परिवर्तन है परन्तु इसकी नियमितता से सभी का आपसी प्रेम और सामंजस्य और भी प्रगाढ़ होगा । और स्त्री को अपने लिए भी कुछ समय मिल जाएगा ।
परिवार की पाठशाला में सादगी मितव्ययता ,स्वच्छता ,और सहयोग जैसे विचारों का आदान - प्रदान तभी संभव होगा जब घर के सभी लोग प्रत्येक गतिविधि में भाग लें । यहाँ बात पुरुष को रोटी बनाना सिखाना या कोई अन्य काम सिखाने की नहीं है बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य घर के प्रत्येक सदस्य को वे गुण सीखाना है जो भावी जीवन में महत्त्वपूर्ण सफलताओं के आधार बन सकते हैं ।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

३३ -४२ ज्ञान की महिमा

३३ -४२ ज्ञान की महिमा 
श्रेयान्द्रव्यमयाद्याज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तपः ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥
अर्थ -हे परंतप  अर्जुन !द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है ,तथा
यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं ॥३३॥

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ||
अर्थ-उस ज्ञान को तु तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ ,उनको भलीभाँति
दंडवत प्रणाम करने से ,उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलता पूर्वक
प्रश्न करने से वे परमात्मतत्त्व को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस
तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे ॥३४॥

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषणे द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥
अर्थ -जिसको जानकर तू फिर इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा तथा हे अर्जुन !
जिस ज्ञान के द्वारा तू सम्पूर्ण भूतों को निःशेषभाव से पहले अपने में (सर्वव्यापी
अनंत चेतन में एकीभाव से स्थितिरूप योग से युक्त आत्मा वाला तथा सबमें
समभाव से देखने वाला योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सम्पूर्ण
भूतों को आत्मा कल्पित देखता है )और पीछे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा
में देखेगा ( जो पुरुष सम्पूर्ण भूतों में सबके आत्म रूप मुझ वासुदेव को ही व्यापक
देखता है और सम्पूर्ण भूतों को मुझ वासुदेव के अंतर्गत देखता है ,उसके लिए मै
अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता ।) ॥३५॥

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥
अर्थ-यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है ;तो भी तू ज्ञानरूप
 नौका द्वारा निःसंदेह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जाएगा ॥ ३६ ॥

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्म्सात्कुरुतेऽर्जुन |
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ||
अर्थ-क्योंकि हे अर्जुन !जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर देता है ,वैसे
ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देता है ॥ ३७॥

न ही ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः  कालेनात्मनि विन्दति ॥
अर्थ -इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है । उस
ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग के द्वारा शुद्धान्तः करण हुआ मनुष्य अपने आप
ही आत्मा में पा लेता है ॥ ३८ ॥

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
अर्थ- जितेन्द्रिय साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान
को प्राप्त होकरवह बिना विलम्ब के -तत्काल ही भगवत्प्राप्ति रूप परम शान्ति को प्राप्त
हो जाता है ॥ ३९ ॥

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति |
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः||
अर्थ-विवेकहीन और श्रद्धारहित संशय युक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है |
ऐसे संशय युक्त मनुष्य के लिये न यह लोक है ,न परलोक है ओर न सुख ही है ॥ ४०॥

योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् |
 आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ||
अर्थ-हे धनञ्ज्य !जिसने कर्मयोग कि विधि से समस्त कर्मों का परमात्मा मे अर्पण कर
 दिया है और जिसने विवेक द्वारा समस्त संशयों का नाश कर दिया है,ऐसे वश में किये हुए
अन्तःकरण वाले पुरुष को कर्म नहीं बांधते ॥ ४१॥

तस्मादज्ञानसम्भूतं ह्रत्स्थं ज्ञानासि नात्मनः ।
 छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥
अर्थ-इसलिए हे भारतवंशी अर्जुन!तू ह्रदय में स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशय का
विवेकज्ञानरूप तलवार द्वारा छेदन करके समत्त्वरूप कर्मयोग में स्थित हो जा और युद्ध
 के लिए खड़ा हो जा ॥ ४२॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे
ज्ञानकर्मसन्न्यासयोगो  नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥