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मंगलवार, 26 मई 2015

महाकवि कालिदास

महाकवि कालिदास
जीवनवृत्त
भारतीय  साहित्य कि विभूति सम्पूर्ण कविकुल सम्राट कालिदास काव्य जगत के दैदीप्यमान रत्न हैं |
काव्य रसिकों ने इन्हें कविता -कामिनी -विलास कहा है |समालोचकों ने प्राचीन कवियों की गणना में कालिदास को 'कनिष्ठिकाधिष्ठित 'बताकर उनकी स्पर्धा में ठहरने वाले किसी अन्य प्रतिस्पर्धी कवि के अस्तित्व की संभावना का ही खंडन  किया है -
''पुरा कवीनां गणनाप्रसङ्गे कनिष्ठिकाधिष्ठित कालिदासः |
अद्यापि तत्तुल्य कवेर्भावदनामिका सार्थवती बभूवः ||''
जैसी किंवदन्ती कालिदास की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करती है |आचार्य आनन्दवर्धन ने भी कवि की गणना विश्व विख्यात महाकवियों में की है -
''अस्मिन्नतिविचित्रकविपरम्परावाहिनि संसारे कालिदासप्रभृतयो द्वित्राः पञ्चषा एव वा महाकवय इति  गण्यते। ''
 अर्थात् इस अतिविचित्र कवियों की परम्परा को वहन करने वाले संसार में कालिदास आदि दो तीन या पांच छः ही कवि गिने जाते हैं | ''(ध्वन्यालोक १/६)
 महाकवि हमारे राष्ट्रीय कवि हैं तथा भारतीय  संस्कृति के प्रमुख परिपोषक भी |इनकी काव्य वाणी में संपूर्ण भारत की संस्कृति बोलती है |कालिदास ने जैसा मानव हृदय के सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों का निरीक्षण किया वैसा अन्य ने नहीं ,कालिदास अन्तर तथा बाह्य दोनों जगत् के सूक्ष्म निरीक्षक कवि हैं |
संस्कृत साहित्य के उपवन में कालिदास का समागम एक ''वसन्त दूत ''के रूप में हुआ है । उन्होंने संस्कृत भाषा को वाणी दी ,नए भाव ,नई  दिशाएँ ,नए विचार और नई पद्धतियाँ दी हैं ।
कालिदास संस्कृत के सबसे बड़े कवि और नाटककार हुए । परवर्ती संस्कृत ,हिंदी एवं कुछ विषयों में विदेशी कवि भी कालिदास के ऋणी हैं । जर्मनी के प्रसिद्ध कवि ''गेटे ''के ''फ़ाउस्ट ''नामक नाटक में शाकुन्तल का प्रभाव परिलक्षित होता है । महाकवि कालिदास के विषय में बड़े -बड़े विद्वानों  विचार प्रकट किये हैं ।
मैकडोनल के शब्दों में ''कालिदास की कविता में भारतीय प्रतिभा का उत्कृष्ट रूप समाविष्ट है । उनके काव्य में भावों का ऐसा सामंजस्य है जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता । (ए हिस्ट्री ऑफ़ संस्कृत लिट्रेचर,पृ. ५५३ )
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में '' भारतीय धर्म , दर्शन , शिल्प और साधना में जो कुछ उदात्त है ,जो कुछ ललित और मोहन है ,उनका प्रयत्न पूर्वक सजाया सँवारा रूप कालिदास का काव्य है । ''
कालिदास की समता तो आज तक कोई और कवि कर ही नहीं पाया । उनकी सभी रचनाओं में अत्यंत प्रेम और भाव विभोर कर देने वाली अविनाशिनी शक्ति विद्यमान है । अतः दो सहस्र वर्षों बाद भी उनकी रचनाएँ यथावत आनंददायक हैं ।संस्कृत के सुप्रसिद्ध कवि बाणभट्ट ने लिखा है -
                              ''निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु ।
                                  प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥ ''
मेघदूत की प्रसंशा करते हुए मनोमुग्ध होकर यूरोपीय विद्वजनों ने अपने योरोप के साहित्य में किसी काव्य को इसकी समता के योग्य नहीं माना । मिस्टर मोन फांचे (Mr.Mon Fanche ) ने कहा है - 
''There is nothing so perfect in the elegiac litreature of Europe as the Meghaduta of Kalidas.''
एक अन्य जर्मन विद्वान ने कहा है -
''There exist for instance in our European litreature few pieces to be compared with the Meghaduta in Sentiment and beauty.''
अभिज्ञानशाकुंतलम कालिदास की सर्वोत्कृष्ट रचना है । यह सात अङ्क का नाटक है इसमें हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त और महर्षि कण्व की पालिता धर्म -कन्या शकुन्तला की प्रणयगाथा निबद्ध है । महर्षि कण्व की अनुपस्थिति में उनके तपोवन में दुष्यंत और शकुन्तला का प्रथम मिलन होता है ,और वही मिलन ''गन्धर्व विवाह'' का रूप धारण कर लेता है । राजा दुष्यंत महर्षि कण्व के आगमन से पूर्व ही अपनी राजधानी को प्रस्थान करते समय अपनी प्रियतमा शकुन्तला को स्वनामांकित मुद्रिका देते हुए कहते हैं कि - यह मेरी याद दिलाएगी । इसी बीच अतिथि सत्कार में शकुन्तला की असावधानी दुर्वासा ऋषि के शाप का कारण बनती है । किन्तु उसकी दोनों सखियों को यह रहस्य पता है कि शापवश राजा शकुन्तला को देखकर तब तक नहीं  पहचान सकेगा , जब तक वह किसी ''अभिज्ञान ''का दर्शन ना कर ले । महर्षि कण्व आश्रम में लौट कर शकुन्तला के '' गन्धर्व विवाह '' का समाचार ज्ञात करके प्रसन्न हैं तथा उसे गर्भवती जानकार राजा के पास भेजना चाहते हैं । आश्रम से राजधानी जाते समय सखियाँ शकुन्तला को बताती हैं  की यदि राजा पहचानने से तुम्हें भूल करे तो उसे नामांकित मुद्रा दिखा देना । राजा शकुन्तला को शापवश नहीं पहचान पाता तो शकुन्तला उसको मुद्रिका दिखाना चाहती है किन्तु वह अँगूठी तो ''शक्रावतार ''में शची तीर्थ के जल को प्रणाम करते समय उसके हाथ से स्खलित हो चुकी थी । कुछ दिन बाद ही वह अँगूठी राजा के पास पहुँचती है ,तब वह सम्पूर्ण घटना का स्मरण करके शकुन्तला की खोज में जाते हैं । अंत में पुनर्मिलन के साथ नाटक समाप्त होता है ।
कालिदास ने अभिज्ञान - शाकुन्तल में महाभारत के ''शकुन्तलोपाख्यान ''के इतिवृत्त को अपनी नवनवोन्मेष शालिनी प्रतिभा से सरस एवं गरिमामय बनाकर प्रस्तुत किया है। चतुर्थ अङ्क में उनकी कला चरमोत्कर्ष पर
है -  ''काव्येषु नाटकं रम्यं ,तत्र रम्या शकुन्तला ।
तत्रापि चतुर्थोङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम् । । ''
और -''कालिदासस्य सर्वस्वमभिज्ञानशकुन्तलम् ॥'' 
''अभिज्ञानशाकुन्तल ''संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नाटक है । इसके सात अंकों में दुष्यंत शकुन्तला के प्रेम ,वियोग और पुनर्मिलन का वर्णन है । इसका प्रधान रस संभोग(संयोग) श्रृंगार तथा विप्रलम्भ श्रृंगार है । करुण ,वीर ,अद्भुत ,हास्य ,भयानक ,और शान्त ये सहयोगी रस हैं । यह नाटक सुखान्त है इसमें वैदर्भी रीति का मुख्यतः प्रयोग हुआ है । इसके नायक दुष्यंत धीरोदात्त नायक हैं । दुष्यंत के व्यक्तित्व को सजीव बनाकर चित्रित किया है । दुष्यंत बलिष्ठ एवं पराक्रम शाली ,ललित कलाओं का मर्मज्ञ ,प्रकृति प्रेमी एवं कुशल चित्रकार है । उसमें मानवोचित दुर्बलताएं भी हैं ,किन्तु वह पुत्र वत्सल ,कवि ,कलाकोविद एवं कर्तव्य परायण राजा है ।
शकुन्तला निसर्ग कन्या है । पिता कण्व के प्रति उसके हृदय में असीम प्रेम है । कवि ने कण्व को वत्सल पिता एवं सद्गृहस्थ के रूप में चित्रित किया है ।
अभिज्ञानशाकुन्तल में कालिदास ने प्रेम और सौंदर्य का सुन्दर सामंजस्य प्रस्तुत किया है । उन्होंने केवल मानव सौंदर्य का ही वर्णन नहीं किया है ,वरन प्राकृतिक सौंदर्य के चित्रों का भी अत्यंत भव्य एवं मनोहारी चित्रण प्रस्तुत किया है ।
महाकवि कालिदास ने अपने नाटकों में तत्कालीन समाज का चित्रण यथास्थान किया है । उस युग के सामाजिक ,सांस्कृतिक , राजनैतिक,धार्मिक एवं पारिवारिक जीवन का यथार्थ चित्रण अभिज्ञानशाकुन्तल में मिलता है ।
कालिदास की लोकप्रियता का कारण उनकी सरल ,परिष्कृत और प्रसाद गुण पूर्ण शैली है कालिदास में कल्पना की ऊँची उड़ान है ,भावों में गम्भीरता है । विचारों में जीवन की घनी अनुभूति है ,भाषा में लोच और प्रांजलता है । उनकी कविता में मादकता है ,घटना संयोजन सुविचारित है । बाह्य एवं अन्तः प्रकृति का  सूक्ष्म विश्लेषण हुआ है । चरित्र चित्रण में वैयत्तिकता को प्रधानता दी गई है, वर्णनों में अलंकारों की प्रधानता न होकर प्राकृतिक सुषमा की प्रमुखता है । उनकी भाषा में ध्वन्यात्मकता और प्रवाह है । उनका शब्द कोष अगाध है । उनकी उपमाएं बेजोड़ होती हैं इसीलिए उनके विषय में ''उपमा कालिदासस्य''यह कथन सुविश्रुत है । उन्होंने स्वाभाविक रूप से उपमा ,रूपक ,स्वभावोक्ति ,निदर्शना,दीपक ,विभावना ,व्यतिरेक ,अर्थान्तरन्यास ,अनुप्रास ,यमक ,श्लेष ,उत्प्रेक्षा ,आदि अलंकारों का प्रयोग किया है । इसी प्रकार विविध प्रकार के छन्दों का प्रयोग करने में कालिदास सिद्ध हस्त हैं । उनकी रचनाओं में आर्या ,अनुष्टुप ,वंशस्थ ,,वसन्ततिलका ,मालिनी ,मन्दाक्रान्ता ,शिखरिणी ,शार्दूलविक्रीड़ित आदि छन्द पाठकों का मन अपनी ओर आकर्षित कर उन्हें भाव विभोर करते रहते हैं । कालिदास सर्वतोमुखी प्रतिभासम्पन्न महाकवि एवं नाटककार हैं । वे साहित्य प्रकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं । उनकी रचनाओं में स्वर्गीय आनन्द ,भौतिक विलास ,दैवी दिव्यता ,मानवीय मनोज्ञता और सात्विक सम्मोहन एक साथ सुलभ होकर निदर्शित है ।
 कालिदास की रचनाओं में सभी नाट्य कला सम्बन्धी विशेषतायें हैं ,तथापि इनका प्रकृति चित्रण अप्रतिम एवं अत्यंत रमणीय है। कालिदास की काव्य कला का विकास ही प्रकृति वर्णन से आरम्भहोताहै।
कालिदास प्रकृति नटी  के कुशल चितेरे हैं । उनका प्रकृति वर्णन सूक्षम और यथार्थ है प्रकृति को जितना महत्त्व पूर्ण स्थान कालिदास के काव्य में मिला है उतना परवर्ती साहित्य में नहीं । नारी सौंदर्य एवं नायिकाओं के अलंकरण के लिए भी वे प्राकृतिक उपादानों का ही ग्रहण करते हैं । जैसे वसंत पुष्पों से अलंकृत पार्वती -
                                     ''अशोकनिर्भत्सितपद्मरागमाकृष्टहेमद्युतिकर्णकारम् |
                                       मुक्ताकलापीकृत्सिन्दुवारं वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती ||''(कुमारसम्भवम्३/५३ )
अर्थात अशोक के पुष्प से पद्मराग मणि का तिरस्कार करने वाले ,सोने की कान्ति को ग्रहण करने वाले हार के समान किये गये निर्गुण्डी के पुष्पों वाले ऐसे वसन्त ऋतु के फूल रूप भूषण को धारण करति हुई (पर्वतराज कन्या दिखाई पड़ी । )
प्रकृति के आलम्बन ,उद्दीपन ,मानवीकृत ,उपदेशात्मक  मानव की सहचरी आदि विविध रूप कवि की कुशल लेखनी से मूर्त हो उठे हैं । कालिदास ने अपनी रचनाओं में प्रकृति के दिव्या रूप की भी प्रतिष्ठा की है । अभिज्ञानशाकुंतलम् में तो आरम्भ से अंत तक कोमल एवं सरस प्रकृति का भव्य वर्णन मिलता है । शकुन्तला तो प्रकृति कन्या ही है । वह प्रकृति की उन्मुक्त वातावरण में ही उत्पन्न हुई ,प्रकृति ने ही उसका पालन पोषण किया और उसका श्रृंगार प्रसाधन दिए और उसका अधिकांश जीवन ही प्रकृति की गोद  में ही व्यतीत हुआ । महर्षि कण्व के शब्दों में ''शान्ते करिष्यसि पदं पुनराश्रमेऽस्मिन् ''उसने अपना अन्तिम जीवन भी प्रकृति की गोद में ही व्यतीत किया |
मेघदूत गीतिकव्य तो प्रकृति काव्य ही है | उनका मेघ एक प्रकृति का ही अंग है ;तथा उसका सारा कार्य व्यापार प्रकृति क्रीड़ा ही है । भारत वर्ष के भव्य प्राकृतिक दृश्य इस गीतिकाव्य में देखने को मिलते हैं । अतः यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी कि कालिदास मूलतः प्रकृति के ही कवि हैं । 
कवि की सर्वप्रथम रचना ''ऋतुसंहार ''है । इसमें कवि ने विभिन्न ऋतुओं से मानवों पर पड़ने वाले प्रभावों का तथा उनके परिणामों का सुन्दर सरस वर्णन किया है । उन्होंने प्राकृतिक दृश्यों पर चेतन धर्म का समारोप कर उसका आलंकारिक चित्र प्रस्तुत किया है और कहीं कहीं प्रकृति को शुद्ध आलम्बन रूप में रखकर उसके प्रति अपना अनुराग व्यक्त किया है । कवि ने कामिनियों के उन विचारों और भावों का ही विशेष रूप से वर्णन किया है जो की इसमें प्रकृति के प्रभाव से उत्पन्न हुए हैं । इन कामिनियों के भावों का ही वर्णन करने के लिए ही कवि ने मानो प्रकृति की पृष्ठ भूमि का आश्रय लिया है । 
कालिदास कि प्रसंशा मे कहा गया है -
 ''पुष्पेषु चम्पा ,नगरीषु काञ्ची,
नदीषु गङ्गा ,नृपतौ च रामः |
नारीषु रम्भा .पुरुषेषु विष्णुः ,
काव्येषु माघः ,कवि कालिदासः ||''

सोमवार, 25 मई 2015

अभिज्ञानशाकुन्तलम्



अभिज्ञानशाकुन्तलम्
यह कालिदास की सर्वोत्कृष्ट रचना है । यह सात अङ्क का नाटक है इसमें हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त और महर्षि कण्व की पालिता धर्म -कन्या शकुन्तला की प्रणयगाथा निबद्ध है । महर्षि कण्व की अनुपस्थिति में उनके तपोवन में दुष्यंत और शकुन्तला का प्रथम मिलन होता है ,और वही मिलन ''गन्धर्व विवाह'' का रूप धारण कर लेता है । राजा दुष्यंत महर्षि कण्व के आगमन से पूर्व ही अपनी राजधानी को प्रस्थान करते समय अपनी प्रियतमा शकुन्तला को स्वनामांकित मुद्रिका देते हुए कहते हैं कि - यह मेरी याद दिलाएगी । इसी बीच अतिथि सत्कार में शकुन्तला की असावधानी दुर्वासा ऋषि के शाप का कारण बनती है । किन्तु उसकी दोनों सखियों को यह रहस्य पता है कि शापवश राजा शकुन्तला को देखकर तब तक नहीं  पहचान सकेगा , जब तक वह किसी ''अभिज्ञान ''का दर्शन ना कर ले । महर्षि कण्व आश्रम में लौट कर शकुन्तला के '' गन्धर्व विवाह '' का समाचार ज्ञात करके प्रसन्न हैं तथा उसे गर्भवती जानकार राजा के पास भेजना चाहते हैं । आश्रम से राजधानी जाते समय सखियाँ शकुन्तला को बताती हैं  की यदि राजा पहचानने से तुम्हें भूल करे तो उसे नामांकित मुद्रा दिखा देना । राजा शकुन्तला को शापवश नहीं पहचान पाता तो शकुन्तला उसको मुद्रिका दिखाना चाहती है किन्तु वह अँगूठी तो ''शक्रावतार ''में शची तीर्थ के जल को प्रणाम करते समय उसके हाथ से स्खलित हो चुकी थी । कुछ दिन बाद ही वह अँगूठी राजा के पास पहुँचती है ,तब वह सम्पूर्ण घटना का स्मरण करके शकुन्तला की खोज में जाते हैं । अंत में पुनर्मिलन के साथ नाटक समाप्त होता है ।
कालिदास ने अभिज्ञान - शाकुन्तल में महाभारत के ''शकुन्तलोपाख्यान ''के इतिवृत्त को अपनी नवनवोन्मेष शालिनी प्रतिभा से सरस एवं गरिमामय बनाकर प्रस्तुत किया है। चतुर्थ अङ्क में उनकी कला चरमोत्कर्ष पर
है -  ''काव्येषु नाटकं रम्यं ,तत्र रम्या शकुन्तला ।
तत्रापि चतुर्थोङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम् । । ''
और -
'' कालिदासस्य सर्वस्वमभिज्ञानशकुन्तलम् ॥''
''अभिज्ञानशाकुन्तल ''संस्कृत साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नाटक है । इसके सात अंकों में दुष्यंत शकुन्तला के प्रेम ,वियोग और पुनर्मिलन का वर्णन है । इसका प्रधान रस संभोग(संयोग) श्रृंगार तथा विप्रलम्भ श्रृंगार है । करुण ,वीर ,अद्भुत ,हास्य ,भयानक ,और शान्त ये सहयोगी रस हैं । यह नाटक सुखान्त है इसमें वैदर्भी रीति का मुख्यतः प्रयोग हुआ है । इसके नायक दुष्यंत धीरोदात्त नायक हैं । दुष्यंत के व्यक्तित्व को सजीव बनाकर चित्रित किया है । दुष्यंत बलिष्ठ एवं पराक्रम शाली ,ललित कलाओं का मर्मज्ञ ,प्रकृति प्रेमी एवं कुशल चित्रकार है । उसमें मानवोचित दुर्बलताएं भी हैं ,किन्तु वह पुत्र वत्सल ,कवि ,कलाकोविद एवं कर्तव्य परायण राजा है ।
शकुन्तला निसर्ग कन्या है । पिता कण्व के प्रति उसके हृदय में असीम प्रेम है । कवि ने कण्व को वत्सल पिता एवं सद्गृहस्थ के रूप में चित्रित किया है ।
अभिज्ञानशाकुन्तल में कालिदास ने प्रेम और सौंदर्य का सुन्दर सामंजस्य प्रस्तुत किया है । उन्होंने केवल मानव सौंदर्य का ही वर्णन नहीं किया है ,वरन प्राकृतिक सौंदर्य के चित्रों का भी अत्यंत भव्य एवं मनोहारी चित्रण प्रस्तुत किया है ।
महाकवि कालिदास ने अपने नाटकों में तत्कालीन समाज का चित्रण यथास्थान किया है । उस युग के सामाजिक ,सांस्कृतिक , राजनैतिक,धार्मिक एवं पारिवारिक जीवन का यथार्थ चित्रण अभिज्ञानशाकुन्तल में मिलता है ।
कालिदास की लोकप्रियता का कारण उनकी सरल ,परिष्कृत और प्रसाद गुण पूर्ण शैली है कालिदास में कल्पना की ऊँची उड़ान है ,भावों में गम्भीरता है । विचारों में जीवन की घनी अनुभूति है ,भाषा में लोच और प्रांजलता है । उनकी कविता में मादकता है ,घटना संयोजन सुविचारित है । बाह्य एवं अन्तः प्रकृति का  सूक्ष्म विश्लेषण हुआ है । चरित्र चित्रण में वैयत्तिकता को प्रधानता दी गई है, वर्णनों में अलंकारों की प्रधानता न होकर प्राकृतिक सुषमा की प्रमुखता है । उनकी भाषा में ध्वन्यात्मकता और प्रवाह है । उनका शब्द कोष अगाध है । उनकी उपमाएं बेजोड़ होती हैं इसीलिए उनके विषय में ''उपमा कालिदासस्य''यह कथन सुविश्रुत है । उन्होंने स्वाभाविक रूप से उपमा ,रूपक ,स्वभावोक्ति ,निदर्शना,दीपक ,विभावना ,व्यतिरेक ,अर्थान्तरन्यास ,अनुप्रास ,यमक ,श्लेष ,उत्प्रेक्षा ,आदि अलंकारों का प्रयोग किया है । इसी प्रकार विविध प्रकार के छन्दों का प्रयोग करने में कालिदास सिद्ध हस्त हैं । उनकी रचनाओं में आर्या ,अनुष्टुप ,वंशस्थ ,,वसन्ततिलका ,मालिनी ,मन्दाक्रान्ता ,शिखरिणी ,शार्दूलविक्रीड़ित आदि छन्द पाठकों का मन अपनी ओर आकर्षित कर उन्हें भाव विभोर करते रहते हैं ।
कालिदास सर्वतोमुखी प्रतिभासम्पन्न महाकवि एवं नाटककार हैं । वे साहित्य प्रकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं । उनकी रचनाओं में स्वर्गीय आनन्द ,भौतिक विलास ,दैवी दिव्यता ,मानवीय मनोज्ञता और सात्विक सम्मोहन एक साथ सुलभ होकर निदर्शित है ।


गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

वैदिक साहित्य

                                                       वैदिक साहित्य
                             सत्याहिंसागुणैः श्रेष्ठा ,विश्वबन्धुत्वशिक्षिका । 
                            विश्वशान्तिसुखाधात्री ,भारतीया हि संस्कृतिः ॥ (कपिलस्य)
समाज और साहित्य का घनिष्ठ सम्बन्ध होता है । साहित्य का निर्माण समाज में और समाज के लिए ही होता है । इसी लिए किसी भी साहित्य के लिए एक समाज की पूर्वस्थिति होती है जहाँ वह साहित्य विकसित होता है । जहाँ साहित्य है वहाँ एक शिष्ट समाज होगा ,यह एक सुनिश्चित सिद्धांत है । किन्तु जहाँ समाज है वहाँ साहित्य भी होगा यह आवश्यक नहीं है । प्राचीन भारतीय समाज की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं जिनके कारण विश्व की अन्य सभ्यताओं एवं संस्कृतियों के साहित्य की अपेक्षा उसका साहित्य अधिक मूल रूप में आज भी सुरक्षित है 
 और उसका स्वरूप भी अत्यंत स्पष्ट है । भारतीय साहित्य का प्राचीनतम रूप लिखित में था या नहीं था इस विषय में विद्वानों में बहुत मतभेद हैं । प्राचीन भारतीय साहित्य के सृजन तथा विकास में मौखिक परम्परा का अपना एक विशेष महत्व है । उस समय जो भी साहित्य सृष्ट हुआ ,उसका संरक्षण प्राचीन भारतीयों ने मौखिक रूप से श्रुति परम्परा के द्वारा किया । प्रत्येक प्राणी अपनी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा विषयों के साक्षात्कार के अनन्तर आवश्यकतानुसार विभिन्न जीवन व्यवहार के लिए कर्मेन्द्रियों का प्रयोग  करता है । इस इन्द्रिय प्रयोग के अवसर पर सुख और दुख की अनुभूति जीवन व्यवहार की शिक्षा ग्रहण करना प्रत्येक प्राणी का स्वभाव है । हम न केवल अपने निजी अनुभवों से ही शिक्षा ग्रहण करते हैं अपितु पूर्वजों के अनुभवों से अधिक सीखते हैं । पूर्वजों के अनुभव साहित्य सम्पदा के रूप में  हमें उपलब्ध हैं । जिस साहित्य भण्डार में शिक्षा का वैभव समाहित है ,उसका सर्वप्रथम महनीय रत्न ' वेद ' के  नाम से विख्यात है । पिता - पुत्र ,गुरु - शिष्य - परम्परा में तद्युगीन साहित्य का संरक्षण तथा अग्रेसारण होता रहा है ऋग्वेद में एक मण्डूक की ध्वनि सुनकर दूसरे मण्डूक द्वारा शब्द करने की उपमा , शिष्य द्वारा शिक्षक के शब्द का अनुकरण करने से जो दी गई है वह गुरु - शिष्य - परम्परा से साहित्याध्ययन की ओर संकेत करती है । प्राचीन भारतीय समाज की इसी अद्भुत शिक्षा पद्धति का परिणाम है कि विश्व की अन्य सभ्यताओं का साहित्य जहाँ प्राकृतिक तथा राजनीतिक कारणों से नष्ट हो गया , वहीं इस प्रकार की अनेक आपदाओं से ग्रस्त होने पर भी हमारा साहित्य सुरक्षित रहा ,लुप्त नहीं हुआ । आज हमें वह जिस रूप में उपलब्ध है वह अत्यंत विशाल है । इस विशाल साहित्य को देखकर हम अपने समाज तथा संस्कृति की उदात्तता का अनुमान लगा सकते हैं जहाँ इतने उदात्त तथा विशाल साहित्य का प्रणयन हुआ ।

मंगलवार, 31 मार्च 2015

श्रीमद्भगवद्गीता , अथ चतुर्थोऽध्यायः (२४ - ३२)

२४ - ३२  फल सहित प्रथक् - पृथक् यज्ञों का कथन |

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् |
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||

 अर्थ - जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात् स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किये जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म
 है  तथा ब्रह्म रूप कर्ता के द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है उस ब्रह्मकर्म
 में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किये जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है || २४||

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते |
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यग्येनैवोपजुह्वति ||

अर्थ - दूसरे योगीजन देवताओं के पूजन रूप यज्ञ का ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और
अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मा रूप अग्नि में अभेददर्शनरूप यज्ञ के द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ
के द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं ( परब्रह्म परमात्मा में ज्ञान द्वारा एकीभाव
से स्थित  होना ही ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करना है । ) ॥२५॥

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति |
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ||

अर्थ  - अन्य योगी जन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयम रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं
 और दूसरे योगी लोग शब्दादि समस्त विषयों को इन्द्रिय रूप अग्नियों में हवन किया करते हैं || २६||

सर्वानीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥

अर्थ - दूसरे योगीजन इन्द्रियों की संपूर्ण क्रियाओं को और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित
आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन किया करते हैं (सच्चिदानन्दघन परमात्मा के सिवाय अन्य किसी का
भी न चिंतन करना ही उन सबका हवन करना है । )॥ २७॥

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ।।

अर्थ - कई पुरुष द्रव्य सम्बन्धी यज्ञ करने वाले हैं , कितने ही तपस् या रूप यज्ञ करने वाले हैं तथा दूसरे कितने
ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं ,कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ
करने वाले हैं ॥२८॥

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे |
 प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ||
अपरे नियताहाराः प्रानान्प्राणेषु जुह्वति |
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ||

अर्थ - दूसरे कितने ही योगीजन अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं ,वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में
अपानवायु को हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणायामपरायण पुरुष प्राण
और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं |ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों
का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं || २९-३०||

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ||

अर्थ - हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञ  बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा
को प्राप्त होते हैं | और यज्ञ न करने वाले पुरुष के लिये तो यह मनुष्य लोक भी सुख दायक नहीं है ,फिर
 परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है ?|| ३१||

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणों मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ।।

अर्थ - इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गये हैं | उन सबको तू  मन ,इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान , इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू  कर्म
बन्धन से सर्वथा मुक्त हो जायेगा || ३२||

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप |
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ||

अर्थ - हे परंतप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है , तथा यावन्मात्र संपूर्ण कर्म ज्ञान
में समाप्त हो जाते हैं ||३३ ||

बुधवार, 21 जनवरी 2015

श्रीमद्भगवद्गीता , अथ चतुर्थोऽध्यायः (१९ -२३)

१९ -२३ योगी महात्मा पुरुषों के आचरण और उनकी महिमा |

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः |
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ||

अर्थ - जिसके संपूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और सङ्कल्प के होते हैं तथा जिसके समस्त
कर्म ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हो गये हैं ,उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं || १९||

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्ग नित्यतृप्तो निराश्रयः |
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चि त्करोति सः ||

अर्थ - जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय
से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है ,वह कर्मों में भली भाँति बर्तता हुआ भी वास्तव
में कुछ भी नहीं करता ॥२०॥

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

अर्थ - जिसका अन्तः करण और इन्द्रियों के सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगों
की सामग्री का परित्याग करा दिया है , ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर सम्बन्धी कर्म करता
हुआ भी पापों को नहीं प्राप्त होता ॥२१॥

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

अर्थ - जो बिना इच्छा के अपने आप प्राप्त हुए पदार्थ में सदा संतुष्ट रहता है ,जिसमें ईर्ष्या का
सर्वथा अभाव हो गया है ,जो हर्ष - शोक आदि द्वन्द्वों से सर्वथा अतीत हो गया है - ऐसा सिद्धि
 और असिद्धि में सम रहने वाला कर्मायोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता ॥२२॥

 गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः |
यज्ञाया चरतः  कर्म  समग्रं  प्रविलीयते ||

अर्थ - जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है , जो देहाभिमान और ममता से रहित हो गया है ,
जिसका चित्त निरन्तर परमात्मा के ज्ञान में स्थित रहता है -ऐसा केवल यज्ञसम्पादन के लिये
कर्म करने वाले मनुष्य के संपूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं ॥२३॥

शनिवार, 17 जनवरी 2015

श्रीमद्भगवद्गीता -अथचतुर्थोऽध्यायः , ज्ञानकर्मसन्यासयोग (१ -१८ )

श्रीमद्भगवद्गीता -अथचतुर्थोऽध्यायः , ज्ञानकर्मसन्यासयोग

१ -१८  सगुण भगवान का प्रभाव और कर्म योग का विषय । 

श्रीभगवानुवाच 
इमं विवस्वते योगं प्रोक्त्वानहमव्ययम् |
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ||

अर्थ  - श्रीभगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था ; सूर्य ने अपने पुत्र
 वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा || १ ||

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः |
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ||

अर्थ - हे परन्तप अर्जुन ! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना ; किन्तु 
उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वीलोक में लुप्त प्राय हो गया है || २ ||

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः |
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येत्दुत्तमम् ||

अर्थ - तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है ,इसलिये वहि यह पुरातन योग आज मैंने तुझको कहा है ;
 क्योंकि यह बडा ही उत्तम रहस्य है अर्थात् गुप्त रखने योग्य विषय है ||३ ||

अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ।।

अर्थ - अर्जुन बोले - आपका जन्म तो अर्वाचीन - अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना
है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था । तब मैं इस बात को कैसे समझूँ की आप ही ने कल्प के
आदि में सूर्य से यह योग कहा था ?॥४॥



 श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥

अर्थ - श्रीभगवान बोले - हे परंतप अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं उन सबको तू
नहीं जानता ,किंतु मैं जानता हूँ ॥५॥

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भुतानामीश्वरोऽपि सन् |
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ||

अर्थ  - मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते
हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन  करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ ॥६॥

यदा -यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||

अर्थ - हे भारत ! जब  - जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है ,तब  - तब ही मैं अपने
रूप को रचता हूँ अर्थात् साकार रूप से लोगों के सामने प्रकट होता हूँ ||७||

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ||

अर्थ - साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिये ,पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिये ,और धर्म
की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिये मैं युग -युग में प्रकट हुआ करता हूँ || ८ || 

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः |
तयक्त्वां देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुनः ||

अर्थ  - हे अर्जुन !मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं -इस प्रकार जो मनुष्य
तत्व से ( सर्व शक्तिमान् सच्चिदानन्दघन परमात्मा अज , अविनाशी और सर्वभूतों के परम गति
तथा परम आश्रय हैं ,वे केवल धर्म को स्थापन करने के लिये ही अपनी योगमाया से सगुण रूप
होकर प्रकट होते हैं ,इसलिये परमेश्वर के समान सुहृद् ,प्रेमी और पतितपावन दूसरा कोई नहीं है ,
ऐसा समझकर जो पुरुष परमेश्वर का अनन्य प्रेम से निरन्तर चिन्तन करता हुआ आसक्तिरहित
संसार में बर्तता है ,वही उनको तत्व से जानता है | ) जान लेता है ,वह शरीर को त्याग कर फिर
जन्म को प्राप्त नहीं होता ,किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है || ९ ||

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः |
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ||

अर्थ - पहले भी , जिनके राग ,भय और क्रोध सर्वथा नष्ट हो गये थे और जो मुझमें अनन्यप्रेमपूर्वक
स्थित रहते थे ,ऐसे मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त उपर्युक्त ज्ञानरूप तप से पवित्र होकर मेरे
स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं || १०||

ये यथा मां प्रपद्यते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||

अर्थ - हे अर्जुन !जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं ,मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ ;क्योंकि
सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं || ११||

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः |
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ||

अर्थ - इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं  का पूजन किया करते हैं ;
क्योंकि उनको कर्मों से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है || १२||

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम् ||

अर्थ - ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र - इन चार वर्णों का समूह ,गुण और कर्मों के विभाग पूर्वक
मेरे द्वारा रचा गया है | इस प्रकार उस सृष्टि रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी
परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जान || १३||

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ||

अर्थ - कर्मोम्के फल में मेरी स्पृहा नहीं है ,इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते - इस प्रकार जो मुझे
तत्त्व से जान लेता है ,वह भी कर्मों से नहीं बँधता ॥१४॥

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वेरपि मुमुक्षुभिः |
कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वेः पूर्वतरं कृतम् ||

अर्थ - पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किये हैं | इसलिये तू भी पूर्वजों द्वारा
सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही कर ॥१५॥

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः |
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||

अर्थ - कर्म क्या है ? और अकर्म क्या है ? -इस प्रकार इसका निर्णय करने में बुद्धिमान् पुरुष भी
मोहित हो जाते हैं | इसलिये वह कर्मतत्व मैं तुझे भली भांति समझाकर कहूँगा ,जिसे जानकर
तू अशुभ से अर्थात कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा ॥१६॥

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः |
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ||

अर्थ - कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिये तथा विकर्म
का स्वरूप भी जानना चाहिये ;क्योंकि कर्म की गति गहन है || १७||
 
कर्मण्यकर्मः यः  पश्येदकर्मणि च कर्मा यः ।
सा बुद्धिमान्मनुष्येषु सा युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ||

अर्थ  - जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है,वह मनुष्यों में बुद्धिमान् है
और वह योगी समस्त कर्मों को करने वाला है || १८ ॥






रविवार, 16 नवंबर 2014

स्त्री शिक्षा का विकास एवं महत्त्व ( शेष अंश )

स्त्री शिक्षा का विकास एवं महत्त्व ( शेष अंश )
वैदिक काल से लेकर आज तक हमारे लिए शिक्षा का अर्थ वह प्रकाश स्रोत है जो जीवन
के विभिन्न क्षेत्रों में हमारा मार्गदर्शन करता है । इतिहास बताता है की भारत प्राचीन काल
में वैभवशाली व गौरवमय देशों में रहा है यहाँ की शिक्षा व्यवस्था सभ्यता एवं संस्कृति की
 द्योतक है । इसकी नींव आध्यात्मिकता पर आधारित रही है । कल लोग यहाँ की शिक्षा ,
सभ्यता , तथा संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित होकर आते थे , और आज यह कैसी 
विडम्बना है की हम अपने अस्तित्व को ही खो बैठे हैं । आज हम पहले विदेशी बाद में 
भारतीय होते जा रहे हैं । अपनी शिक्षा व्यवस्था , परिस्थिति , आवश्यकताओं तथा 
सामाजिक दशा की अवहेलना करके बिना विचार विदेशी शिक्षा व्यवस्था से प्रभावित 
होते जा रहे है । आज हमारे देश के छात्र - छात्राएं दूसरे देश में अध्ययन करने को अपना 
सौभाग्य  मानने लगे हैं ,जबकि हमारे यहां प्राचीन समय में विश्व के कोने कोने से छात्र 
अध्ययन करने आते थे ।
स्त्रियों को प्राचीन काल से भी शिक्षा का अधिकार था , परन्तु आज स्थिति बहुत अधिक
संतोषजनक नहीं है । भारतीय साहित्य तथा संस्कृति के इतिहास में स्त्रियों का आध्यात्मिक
स्वरूप विकृत नहीं हुआ है । आज भी स्त्रियां गृहस्वामिनी और अर्द्धांगिनी के रूप में ही मुख्य
रूप से दिखाई देतीं हैं ऋग्वैदिक काल में स्त्रियों की वैयत्तिक मर्यादा सुरक्षित थी । स्त्रियों
को लौकिक एवं पारलौकिक दोनों ही क्षेत्रों में कल्याणकारी रूप में देखा जाता था ।स्त्रियों
की महत्ता को वैदिक साहित्य साहित्य में मुक्त कंठ से वर्णित किया गया है । वैदिक
वाङ्गमय  में लक्ष्मी ,शक्ति ,दुर्गा की श्रेणी में अदिति इन्द्राणी , उषा , इळा ,भारती श्रद्धा
आदि को स्थान दिया गया है तथा ये देवियाँ उनके तत्वों की अधिष्ठात्री देवी कही गयी
हैं । इसमे सर्वशक्तिशाली अदिति की संतान आकाश , माता - पिता और समस्त देवता
हैं ।
वेदों में कहा गया है की ब्रह्मचारिणी स्त्रियों का विवाह विद्वान पुरुष से ही होना चाहिये ,
साथ ही स्त्रियों के वैदुष्यपूर्ण व्यवहार एवं शिक्षा की भी चर्चा है। अथर्ववेद में कुमारियों
के ब्रह्मचर्य  जीवन तथा विद्या प्राप्ति का परिचय मिलता है , जिसके पश्चात ही वे
युवा पति प्राप्त करतीं थीं । वेदों में बहुत सारे मन्त्रों को स्त्री द्वारा ही पढ़वाया गया
है । स्त्रियों का पढ़ना अत्यन्तावश्यक था क्योंकि बिना पढ़े वे अग्निहोत्र नहीं कर
सकतीं थी ।
भारतीय मानस वैदिक काल में या आधुनिक काल में अनेक रूपों में समान है । महात्मा
गाँधी का विचार था कि पारिवारिक गाड़ी के संचालन में स्त्री -पुरुष पहिये के समान हैं ।
अतः पारस्परिक समझ और उत्तरदायित्वों के निर्वाह हेतु दोनों को  शिक्षित होना
चाहिए । एक पहिये के विपरीत स्थिति में रहने के कारण दांपत्य रूपी गाड़ी का
संचालन असुविधा जनक हो जाता है। गाँधीजी स्त्री शिक्षा को अत्यधिक महत्वपूर्ण
मानते थे तथा आरंभ से ही उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा का विधान किया । सर्वप्रथम
शिक्षा माता से ही आरंभ होती थी । मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि बच्चा माता
के गर्भ से ही शिक्षा ग्रहण करना आरंभ कर देता है ।
अतः हम समझ सकते हैं कि कन्या का शिक्षित होना कितना आवश्यक है । हम
समाज में एक पुरुष को शिक्षित करके केवल एक व्यक्ति विशेष को करते हैं ,किन्तु
एक स्त्री को शिक्षित करने का अभिप्राय है संपूर्ण परिवार और आने वाली पीढ़ियों को
 शिक्षित करना । अतः आज भारत में स्त्री शिक्षा की बहुत आवश्यकता है ।
परिवार ,समाज और राष्ट्र के निर्माण में इतना अधिक महत्वपूर्ण स्थान होने के बाद
भी आधुनिक भारत की असंख्य स्त्रियाँ अशिक्षित हैं उन्हें अक्षर ज्ञान भी नहीं है ।
शहरों में कुछ व्यवस्था हुई भी  परन्तु गाँव में दशा बहुत ही विचारणीय है ।
भारतीय आर्थिक ढाँचा कुछ ऐसा है कि एक ही परिवार के कुछ लोग सभी सुख -
सुविधाओं का भोग कर रहा है और वहीं कुछ लोग दाने - दाने को तरस रहे हैं ।
यह असमानता भी स्त्री शिक्षा बहुत बाधक सिद्ध होती  है । आज अपना पेट 
भरने के लिए सभी ग्रामीणों को अपनी बालिकाओं को खेतों में मजदूरी करने 
अथवा कोई और कार्य करने में लगाना पड़ रहा है । अपनी प्राथमिक जरूरतों 
के कारण  परिवार का हर सदस्य मेहनत मजदूरी करने को बाध्य है । सरकार 
भी स्त्री शिक्षा के लिए व्यवस्था कर पाने में असमर्थ है । बालिकाओं की शिक्षा 
के लिए जो प्रयास किये गए है वे प्रशंसनीय है पर पूर्ण नहीं । आज भी स्त्री शिक्षा 
हेतु कई प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन लोगों की मानसिकता स्त्रियों के प्रति 
परिवर्तित नहीं हो रही है जिससे स्त्रियों को अपना अधिकार प्राप्त करने में 
इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है । स्त्रियों पर पारिवारिक 
अत्याचार ,घर से निकलने पर असुरक्षा का  एहसास जैसे तत्वों के कारण 
आज स्त्रियों की स्थिति और भी बिगड़ती जा रही है । 
घर से बाहर कन्या हो ,माता हो या बहन हो ,सभी स्त्रियाँ अपने आप को 
असुरक्षित पाती हैं । आज छोटी - छोटी बच्चियां तक  दुष्कर्म और शोषण 
का शिकार हो रही है ,जबकि वैदिक काल में इतने अमानवीय कृत्य देखने
 को नहीं मिले । आज स्त्रियों की सुरक्षा हेतु प्रयास निरंतर जारी रखने की 
आवश्यकता है । स्त्रियों के सम्मान में जो कमी आई है वह संस्कारों का 
अभाव ही जान पड़ता है । मनुस्मृति में मनु ने कहा है -
'' यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । 
यत्रैतास्तु न पुज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ॥ ''
अर्थात जहाँ स्त्रियों का आदर किया जाता है वहाँ देवता रमण करते हैं और जहाँ 
स्त्रियों का अनादर होता वहाँ सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं । ऐसी विचारधारा जहाँ 
है वहाँ स्त्रियों का अपमान तथा उनके सत्ता दुराचार असंभव है । 
आज स्त्री की यह स्थिति है की वह कहीं भी जाने में डरती है । वह स्वतंत्रता पूर्वक
कहीं भी नहीं जा सकती ,जबकि वैदिक काल में  स्थिति ऐसी नहीं थी । स्त्रियाँ निर्भीक,
साहसी ,विदुषी तथा ब्रह्मवादिनी होतीं थीं । 
स्त्रियों के निश्चय ,सद्विवेक एवं कार्य कुशलता पर ही उनकी शिक्षा का भविष्य निर्भर 
है। समाज उत्थान के कार्यों में स्त्रियों की सेवा प्राप्त करने के लिए उनका शिक्षित होना 
अत्यावश्यक है । समाज के अंतर्गत अनेको बुराइयाँ जैसे पर्दा प्रथा ,सटी प्रथा ,जादू टोना ,
आदि को दूर करने में एक शिक्षित स्त्री का महत्वपूर्ण योगदान होता है । एक परिवार में 
माता को सर्वप्रथम अध्यापक कहा गया है । जिससे वह बालक को समुचित पथ प्रदर्शन 
करने में समर्थ हो सके । शिक्षा से ही स्त्रियां आत्मनिर्भर एवं स्वतन्त्र बनती हैं ।
भारत की आधी से ज्यादा आबादी निरक्षर है जो शिक्षा के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक 
महत्व से सर्वथा अनभिज्ञ है । उनकी दृष्टि में शिक्षा का कोई विशेष महत्व नहीं है । यही 
विचारों की संकीर्णता स्त्री शिक्षा के मार्ग में बाधक है । देश का अधिकांश परिवारों में 
विशेषकर गाँव में स्त्रियों का घर से निकलना सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता है । 
इस वैचारिक संकीर्णता को दूर करना भी बहुत आवश्यक है ।