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रविवार, 31 अगस्त 2014

श्रीमद्भगवद्गीता -अथप्रथमोऽध्यायः (२८-४७)

२८-४७ मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता ,स्नेह,और शोक युक्त वचन |

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ||
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् |

अर्थ - उन उपस्थित संपूर्ण बन्धुओं को देखकर वे कुन्ती पुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा
से युक्त होकर शोक करते हुए यह  वचन बोले || २७वें का उत्तरार्ध २८वें का पूर्वार्ध ||

अर्जुन उवाच-
दृष्ट्वेमं  स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ||
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति |
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ||

अर्थ  -अर्जुन बोले - हे कृष्ण ! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध क्षेत्रके अभिलाषी इस
 स्वजनसमुदायको देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा
 जा रहा है तथा मेरे शरीर में कंप एवं रोमाञ्च हो रहा है || २८वें का उत्तरार्ध और२९||

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते |
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ||

अर्थ  - हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा
मन भ्रमित-सी हो रहा है ;इसलिये मैं खडा रहने को भी समर्थ नहीं हूं ||३०||

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशवः |
न च श्रेयोऽनुपश्यामि  हत्वा स्वजनमाहवे ||

अर्थ - हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देखा रहा हूं तथा युद्ध में
स्वजन समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता ||३१||

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च |
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ||

अर्थ - हे कृष्ण ! मैं न तो विजय चाहता हूं और न राज्य तथा सुखों को ही |
हे गोविन्द ! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और
 ऐसे जीवन से भी क्या लाभ है ?||३२||

येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च |
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ||

अर्थ- हमें जिनके लिये राज्य,भोग और सुखादि अभीष्ट हैं ,वे ही ये सब धन 
और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खडे. हैं ||३३||

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः |
मातुलाः श्वषुराःपौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ||

अर्थ  - गुरुजन,ताऊ-चाचे लड.के और उसी प्रकार दादे ,मामे ,ससुर ,पौत्र 
साले तथा और भी सम्बन्धी लोग हैं ||३४||

एतान्नहन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन |
अपि त्रैलोक्य राज्यस्य हेतोः किं नु मही कृते ||

अर्थ  - हे मधुसूदन ! मुझे मारने  पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिये 
भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता ;फिर पृथ्वी के लिये तो कहना ही क्या ?||३५||

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन|
पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ||

अर्थ-हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी ? इन आततायियों
 को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा ||३६||

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् |
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम  माधव ||

अर्थ-अतएव हे माधव ! अपने ही बान्धव धार्तराष्ट्र के पुत्रों को मारने  के लिये हम योग्य
नहीं हैं ;क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे ?||३७||

यद्द्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः |
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ||
कथं न ज्ञेयंस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् |
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ||

अर्थ- यद्यपि लोभ से भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और
मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते ,तो भी हे जनार्दन ! कुल के नाश से
उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से हटने के लिये क्यों नहीं
विचार करना चाहिये ?||३८-३९||

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः |
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ||

अर्थ-कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं ,धर्म के नाश हो जाने
पर संपूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है ||४०||

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः |
स्त्रीषु दुष्टाषु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः ||

अर्थ -हे कृष्ण ! पाप के अधिक बढ जाने से कुल की स्त्रियां अत्यन्त दूषित हो जाती हैं
और हे वार्ष्णेय !स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसङ्कर  उत्पन्न होता है ||४१||
 सङ्करो नरकायैव कुलन्घानां कुलस्य च |
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिन्डोदकक्रियाः ||
अर्थ-वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिये ही होता है |लुप्त
हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात् श्राद्ध और तर्पण  से वञ्चित इनके
पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं ||४२||

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः |
उत्साद्द्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ||

अर्थ-इन वर्ण संकर कारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल -धर्म
 और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं ||४३||

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन |
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ||

अर्थ- हे जनार्दन ! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है,ऐसे मनुष्यों का अनिश्चित
काल तक नरक में वास होता है,ऐसा हम सुनते आये हैं ||४४||

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् |
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ||

अर्थ - हा ! शोक !हम लोग बुद्धिमान् होकर भी महान् पाप करने को तैयार हो गये हैं ,
जो राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने  के लिये उद्द्यत हो गये हैं ||४५||

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं  शस्त्रपाणयः |
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ||

अर्थ- यदि मुझ शस्त्र रहित और सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिये
हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक
कल्याणकारक  होगा ||४६||

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् |
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः||

अर्थ-संजय बोले -रण भूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार
कहकर ,बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गये ||४७||

                    ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
                               योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो
                                              नाम प्रथमोऽध्यायः ||१||

श्रीमद्भगवद्गीत -अथ प्रथमोऽध्यायः ( २०-२७ )


२०-२७  अर्जुन द्वारा सेना का पारीक्षण प्रसंग |

 अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः |
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्द्यम्य पाण्डवः ||
ह्रिषीकेशं  तदा वाक्यमिदमाह   महीपते |
अर्जुन उवाच 
सेनयोरुभयोर्मध्ये  रथं स्थापय मेऽच्युत||

अर्थ -हे राजन् ! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बांधकर डटे हुए
धृतराष्ट्र-संबन्धियों को देखकर,उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष
उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा -हे अच्युत ! मेरे रथ
को दोनों सेनाओं के बीच खडा कीजिये ||२०-२१||

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान् |
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्द्यमे ||

अर्थ-और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी
 योद्धाओं  को भली प्रकार देख लूं कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किन
के साथ युद्ध करना योग्य है तब तक उसे खडा रखिये ||२२||

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः |
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ||

अर्थ - दुर्बुद्धि दुर्योधन का हित चाहने वाले जो-जो ये राजा लोग इस सेना में
आये हैं ,इन युद्ध करने वालों को मै देखूंगा ||२३||

सञ्जय उवाच -
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत |
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ||
भीष्मद्रोणाप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् |
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ||

अर्थ - संजय बोले - हे धृतराष्ट्र ! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज
श्रीकृष्णचन्द्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा
संपूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खडा करके इस प्रकार कहा कि हे पार्थ!
युद्ध के लिये जूते हुए इन कौरवों को देख ||२४-२५ ||

तत्रा पश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान् |
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा ||
श्वशुरान्सुह्रिदश्चैव सेनयोरुभयोरपि |

अर्थ -इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनो ही सेनाओं में स्थित ताऊ -चाचों को,
दादों -परदादों को,गुरुओं को,मामाओं को,भाइयों को,पुत्रों को,पौत्रों को,तथा मित्रों
को,ससुरों को,और सुहृदों को भी देखा ||२६और २७वें का पूर्वार्ध ||

शनिवार, 30 अगस्त 2014

श्रीमद्भगवद्गीता - अथ प्रथमोऽध्यायः (१२-१९ )

१२-१९ दोनों सेनाओं की शङ्ख ध्वनि का कथन | 
तस्य सञ्जनयन्  हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः |
सिंहनादं विनद्द्योच्चैः शङ्खंदध्मौ प्रतापवान् ||
अर्थ  -कौरवों में वृद्ध बडे. प्रतापी पितामह भीष्म ने उस
दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न  हुएउच्च स्वर से सिंह की दहाड. के
समान गरजकर शंख बजाया ||१२||

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः |
 सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ||
इसके पश्चात् शङ्ख और नगारे तथा ढोल मृदङ्ग और
नरसिङ्घे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे |उनका वह शब्द
 बडा भयंकर हुआ ||१३||

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ |
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ||

अर्थ -इसके अनन्तर सफेद घोडों से युक्त उत्तम रथ में बैठे
 हुए श्री कृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी शङ्ख बजाये ||१४||

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः |
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ||

श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक ,अर्जुन ने देवदत्त नामक और
भयानक कर्म वाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशन्ख बजाया ||१५||

  अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ||

अर्थ -कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा
 सहदेव ने सुघोष और मनिपुष्पक नामक शङ्ख बजाय ||१६||

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी  महारथः |
धृष्टद्द्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ||
दुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवी |
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् -पृथक् ||

श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्द्युम्न
तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि ,राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पांचों
 पुत्र और बडी भुजा वाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु - इन सभी ने ,हे राजन् !
सब ओर् से अलग -अलग शंख बजाये ||१७-१८||

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् |
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ||

और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथिवी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों
 के अर्थात् आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिये ||१९||

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

श्रीमद्भगवद्गीता - अर्जुनविषाद ,अथप्रथमोऽध्यायः (१-११)

श्रीमद्भगवद्गीता

 







अथप्रथमोऽध्यायः
 १-११  दोनों सेनाओं के प्रधान-प्रधान शूरवीरों की गणनाऔर सामर्थ्य का कथन |

धृतराष्ट्रउवाच  -

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे  समवेता युयुत्सवः |
मामकाः पाण्डवाश्चैव किम कुर्वत सञ्जय ||

 अर्थ  - धृतराष्ट्र बोले -हे संजय !धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित ,युद्ध की
 इच्छा वाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या  किया? ||१||

सञ्जय उवाच-
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा |
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ||

 अर्थ  - संजय बोले-उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की
 सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा ||२||

 पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीम् चमूम् |
 व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ||

 अर्थ  - हे आचार्य-आपके बुद्धिमान्  शिष्य द्रुपदपुत्र ध्रुष्टद्द्युम्न द्वारा
व्यूहाकार खङी की हुई पाण्डु पुत्रों की इस भारी सेना को देखिये ||३||

अत्र शूर महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि |
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ||

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् |
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ||

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् |
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व  एव महारथाः ||

 अर्थ  - इस सेना में बङे-बङे धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद , धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज ,पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य ,पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा,सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र-ये सभी महारथी हैं ||४-५-६||

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम |
नायका मम सैन्यस्य संञ्ज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते ||

 अर्थ  - हे ब्राह्मण श्रेष्ठ ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं उनको आप समझ लीजिये |आपकी जनकारी के लिये मेरी सेना के जो - जो सेनापति हैं ,उनको बतलाता हूं ||७||

भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः |
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ||

 अर्थ  - आप द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी
कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा,विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा ||८||

अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः |
नाना शस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ||

 अर्थ  - और भी मेरे लिये जीवन की आशा त्याग देने वाले बहुत - से शूरवीर अनेक
प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब- युद्ध में चतुर हैं ||९||

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् |
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ||

 अर्थ  - भीष्मपितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और
 भीम द्वारा रक्षिता इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है ||१०||

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः |
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ||

 अर्थ  - इसलिये सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग
सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें ||११||

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

श्रीगणेश चालीसा तथा श्रीगणेशजी की आरती

श्री गणेशाय नमः|

ॐ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ |
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा ||

ॐ गं गणपतये नमो  नमः |

ॐ एक दन्ताय विद्महे वक्रतुन्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् |
ॐ सिद्धि बुद्धिसहिताय ,श्रीमन्महागणाधिपतये नमः |                                  
गजाननं भूतगणादिसेवितम् ,
कपित्थ-जम्बू -फल-चारु -भक्षणम् |
उमासुतं शोक - विनाश कारकम् ,
नमामि विघ्नेश्वर-पाद-पङ्कजम् ||
 गणपति के निम्नलिखित बारह नामों का पाठ प्रतिदिन तीन बार करने से शुभ कार्य में कोई विघ्न नहीं आता -
नारद उवाच -
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकं|
 भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थ सिद्धये ||
प्रथमं वक्रतुण्डं च,एकदन्तं द्वितीयकम् |
तृतीयं कृष्ण पिंगाक्षम् ,गजवक्त्रं चतुर्थकम् ||
 लंबोदरं पंचमं च,षष्ठं विकटमेव च |
सप्तमं विघ्नराजं च धूमवर्णं तथाष्टकं ||
नवमं भालचन्द्रं च ,दशमं तु विनायकम् |
एकादशं गणपतिम् ,द्वादशं तु गजाननम् ||
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः |
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम् ||

श्रीगणेश चालीसा
दोहा -एकदन्त शुभ गजवदन ,विघ्न विनाशक नाम |
श्रीगणेश सिद्धि सदन ,गणनायक सुखधाम|  
मङ्गलमूर्ति महान् श्री ,ऋद्धि-सिद्धि दातार |
 सब देवान में आपको,प्रथम पूज्य अधिकार ||
चौपाई -वक्रतुण्ड श्रीसिद्धि विनायक |जय गणेश सुख सम्पत्ति  दायक||
गिरिजानन्दन,सब गुण सागर |भक्तजनों के भाग्य उजागर ||
श्रीगणेश गणपति सुखदाता |संपत्ति , सुत सौभाग्य प्रदाता ||
राम नाम में दृढ विश्वासा |श्रीमन् नारायण प्रिय दासा ||
 मोदक प्रिय मुषक है वाहन |स्मरण मात्र सब विघ्न नशावन ||
लम्बोदर पीताम्बर धारी |भाल त्रिपुण्ड्र सुशोभित भारी||
मुक्ता-पुष्पमाल गल शोभित |महाकाय भक्तन मन मोहित ||
सुखकर्ता ,दुःखहर्ता देवा|सदा करें संतन जन सेवा |
शरणागत रक्षक गणनायक |भक्तजनों के सदा सहायक ||
शकल शास्त्र सब विद्या ज्ञाता धर्म प्रवक्ता जग विख्याता ||
'महाभारत 'श्रीव्यास बनाया |तब लेखन हित तुम्हें बुलाया ||
शुभ कार्यों में सब नर नारी| प्रथम वन्दना करें तुम्हारी ||
मिट जातीं बाधायें सारी |तुम हो सकल सिद्धि अधिकारी ||
श्रीगणेश के जो गुण गाते |वे जन सकल पदारथ पाते ||
जय गणेश-जय गणपति देवा |तीन लोक करते तब सेवा ||
मास भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी |श्री गणनायक प्रकट जयन्ती ||
श्रद्धा से सब भक्त मनाते |दिव्य चरित महिमा यश गाते ||
श्री गणेश निज भक्त सहायक|विघ्न विनाशक मङ्गल दायक ||
रणथम्भोर दुर्ग गणनायक |महाराष्ट्र के अष्ट विनायक ||
वेद-पुराण-शास्त्र यश गावे |श्रीगणेश सब प्रथम मानावे ||
विघ्नेश्वर श्री सुरप्रिय स्वामी |भक्त करें जय गान स्मरामि ||
सर्वाभीष्ट सिद्धिफल दायक |मोदक प्रिय गणपति गणनायक ||
भालचन्द्र गजमुख शुभकारी|पहले पूजा होत तुम्हारी ||
भक्तजनों को  शुभ वरदायक|श्री गणेश जय वरद विनायक ||
श्री गणेश महिमा अति भारी |इससे परिचित सब नर-नारी ||
गणपति की महिमा सब गाते |ऋद्धि-सिद्धि यश वैभव पाते ||
संकट में जो गणपति ध्यावे |उनके सर्व कष्ट कट  जावे ||
ऋद्धि-सिद्धि बुद्धि बल दायक |सदा सर्वदा विजय प्रदायक ||
वृन्दावन के सिद्ध विनायक |श्रीगणेश ,गणपति गणनायक ||
विघ्न विनाशक,नाम तुम्हारा |करो सिद्ध सब कार्य हमारा ||
सब पर कृपा सदा प्रभु करना |दुःख दारिद्र्य शोक सब हरना ||
श्री मङ्गल विग्रह सुखकारी विनय करो स्वीकार हमारी ||
पत्र पुष्प फल जल लेकर मै |पूजा करें सदा हम घर में ||
जो यह  पठन करें सौ बारा | उन पर गणपति कृपा अपारा ||
एक पाठ भी जो नित करते |उनकी सब विपदायें हरते ||
रोग शोक बन्धन कट  जाते |सुख संपत्ति संतति यश पाते ||
शुभ मङ्गल सुन्दर फल पावे |'श्रीगणेश' चालीसा गावे ||
सफल गजानन करें कामना |भक्त 'गदाधर' रचित प्रार्थना ||
दोहा-श्री गणेश गणपति प्रभो !गणनायक गणराज |
करो सफल मम कामना ,विघ्नेश्वर महाराज ||
श्री गणेशजी की आरती
जय-गणेश , जय-गणेश , जय-गणेश देवा |
माता जाकी पार्वती ,पिता महादेवा ||जय गणेश ..........
पान चढे ,फूल चढे ,और चढे मेवा |
लड्डुन का भोग लागे संत करे सेवा ||जय गणेश ..........
एकदन्त दयावन्त चारभुजा धारी |
मस्तक सिन्दूर सोहै मुसे की सवारी ||जय गणेश ........
अन्धान को आंख देत ,कोढियन को काया |
बांझन को पुत्र देत ,निर्धन को माया ||जय गणेश........

सूर्य श्याम शरण आये सफल कीजै सेवा ||जय गणेश ..... 
दीनन की लाज राखो बन्धु सुतवारी |
कामना को पूर्ण करो जग बलिहारी ||जय गणेश .......
बोलो गणेश महाराज की जय ||

श्रीमद्भगवद्गीता की महिमा

श्रीगीताजी की महिमा
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वास्तव में श्रीमद्भागवद्गीता का महात्म्य वाणी द्वारा वर्णन करने के लिये किसी की भी सामर्थ्य नहीं है ;क्योंकि यह एक परम रहस्यमय ग्रन्थ है |इसमें संपूर्ण वेदों का सार सार संग्रह किया गया है |इसकी संस्कृत इतनी सुन्दर और सरल है लि थोडा सा अभ्यास करने से मनुष्य उसको सहज ही समझ सकता है ;परन्तु इसका आशय इतना गम्भीर है कि आजीवन निरन्तर अभ्यास करते रहने पर भी उसका अन्त नहीं आता |प्रतिदिन नये -नये भाव उत्पन्न होते रहते हैं ,इससे यह सदैव नवीन बना रहता है एवं एकाग्रचित्त होकर श्रद्धा- भक्ति सहितविचार करने से इसके पद-पद में परम रहस्य  भरा हुआ प्रत्यक्ष प्रतीत होता है |भगवान् के गुण ,प्रभाव और मर्म का वर्णन जिस प्रकार इस गीता शास्त्र में किया गया है ,वैसा अन्य ग्रन्थों में मिलना कठिन है ;क्योंकि प्रायः ग्रन्थों में कुछ ना कुछ सांसारिक विषय मिला रहता है |भगवान् ने ''श्रीमद्भगवद्गीता''रूप एक ऐसा अनुपमेय शास्त्र कहा है कि जिसमें एक भी शब्द सदुपदेश से खाली नहीं है श्रीवेदव्यासजी ने महाभारत में गीताजी का वर्णन करने के उपरान्त कहा है-
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः | 
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृताः ||
 'गीता सुगीता करने योग्य है अर्थात्   श्रीगीताजी को भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भाव सहित अन्तः करण  में धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है जो कि स्वयं पद्मनाभ विष्णु के मुखारविन्द से निकली हुई है ;(फिर ) अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या प्रयोजन है ?' स्वयं श्रीभगवान् ने इसके महात्म्य का वर्णन किया है 
(अ .१ ८ श्लोक ,६८ से ७१ तक ) | 
इस गीता शास्त्र में मनुष्य मात्र का अधिकार है ,चाहे वह किसी भी वर्ण ,आश्रम में स्थित हो ;परन्तु भगवान् में श्रद्धालु और भक्तियुक्त अवश्य होना चाहिये ;क्योंकि भगवान् ने अपने भक्तों में ही इसका प्रचार करने के
लिये आज्ञा दी है तथा यह भी कहा है कि ,स्त्री ,वैश्य,शूद्र और पाप योनि भी मेरे परायण होकर परम गति को प्राप्त होते हैं (अ. ९ श्लोक ३२ );अपने - अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा मेरी पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं (अ. १८ श्लोक ४६ )-इन सब पर विचार करने से यही ज्ञात होता है की परमात्मा की प्राप्ति में सभी का अधिकार होता है । परन्तु उक्त विषय के मर्म को न समझने के कारण बहुत से मनुष्य ,जिन्होनें श्रीगीता का नाममात्र ही सुना है ,कहा दिया करते हैं की गीता तो केवल सन्यासियों के लिए ही है ;वे अपने बालकों को भी इसी भय से श्रीगीताजी का अभ्यास नहीं कराते की गीता के ज्ञान से बालक घर छोड़कर कदाचित संन्यासी न हो
 जाये ;किन्तु उनको विचार करना चाहिए कि मोह के कारण क्षात्रधर्म से विमुख  होकर भिक्षा के अन्न से निर्वाह करने के लिए तैयार हुए अर्जुन ने जिस परम रहस्यमय गीता के उपदेश से आजीवन गृहस्थ में रहकर अपने कर्तव्य का पालन किया ,उस गीता शास्त्र का यह उलटा परिणाम किस प्रकार हो सकता है ।अतएव कल्याण
की इच्छा वाले मनुष्यों को उचित है की मोहा का त्याग कर अतिशय श्रद्धा-भक्तिपूर्वक अपने बालकों को अर्थ और भाव सहित श्रीगीताजी का अध्ययन कराएं एवं स्वयं भी इसका पठन और मनन   करते हुए भगवान  आज्ञानुसार साधना करने में तत्पर हो जाएं ;क्योंकि  अतिदुर्लभ  मनुष्य -शरीर को प्राप्त होकर अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी दुःखमूलक  क्षणभंगुर भोगों के भोगने में नष्ट करना उचित नहीं है | 

श्रीगीताजी का प्रधान विषय
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श्री गीताजी में भगवान ने अपनी प्राप्ति के लिये मुख्य दो मार्ग बतलाये हैं --एक साङ्ख्य योग ,दूसरा कर्मयोग -उनमें
  1. संपूर्ण पदार्थ मृग तृष्णा के जल की भांति अथवा स्वप्न की सृष्टि के सदृश मायामय होने से माया के कार्यरूप संपूर्ण गुण ही गुणों में बर्तते हैं ,ऐसे समझकर मन,इन्द्रियों और शरीर द्वारा होने वाले संपूर्ण कर्मों में कर्तापन के अभिमान से रहित होना (अ.५ श्लोक ८-९) तथा सर्वव्यापी सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकीभाव से नित्य स्थित रहते हुए एक सच्चिदानन्दघन वासुदेव के सिवाय अन्य किसी के भी होने का भाव न रहना ,यह  तो साङ्ख्य योग का साधन है तथा
  2. सब कुछ भगवान का समझकर सिद्धि -असिद्धि में समत्व भाव रखते हुए आसक्ति और फल की इच्छा त्याग कर भगवदाज्ञानुसार केवल भगवान् के लिये ही केवल सब कर्मों का आचरण करना (अ.२ श्लोक ४८,अ.५ श्लोक १०) तथा श्रद्धा भक्ति पूर्वक मन ,वाणी और शरीर से सब प्रकार भगवान् के शरण होकर नाम गुण और प्रभावसहित उनके स्वरूप का निरन्तर चिन्तन करना (अ.६ शलोका४७),यह कर्मयोग का साधन है |उक्त दोनों साधनों का परिणाम एक होने के कारण वे वास्तव में अभिन्न माने गये हैं (अ.५ श्लोक ४-५) |परन्तु साधन काल में अधिकारी भेद से दोनों का भेद होने के कारण दोनों मार्ग भिन्न - भिन्न बतलाये गये हैं (अ.३ श्लोक ३)| इसलिये एक पुरुष दोनों मार्गों द्वारा एक काल में नहीं चल सकता ,जैसे श्रीगङ्गाजी पर जाने के लिये दो मार्ग होते हुये भी एक मनुष्य दोनों मार्गों द्वारा एक काल में नहीं जा सकता | उक्त साधनों में कर्मयोग का साधन संन्यास आश्रम में नहीं बन सकता ;क्योंकि सन्यास आश्रम में कर्मों का स्वरूप से भी त्याग कहा गया है और सान्ख्ययोग का साधन सभी आश्रमों में बन सकता है |यदि कहो कि सान्ख्ययोग को भगवान् ने सन्यास के नाम से कहा है ,इसलिये उसका संन्यास आश्रम में ही अधिकार है ,गृहस्थ में नहीं ,तो यह कहना ठीक नहीं है ;क्योंकि दूसरे अध्याय में श्लोक ११से ३०तक जो सान्ख्यनिष्ठा का उपदेश किया गया है ,उसके अनुसार भी भगवान् ने जगह - जगह अर्जुन को युद्ध करने की योग्यता दिखाई है | यदि गृहस्थ में साङ्ख्य योग का अधिकार ही नहीं होता तो भगवान् का इस प्रकार कहना कैसे बन सकता ? हां , इतनी विशेषता अवश्य है कि साङ्ख्यमार्ग का अधिकारी देहाभिमान से रहित होना चाहिये ;क्योंकि जब तक शरीर में अहं भाव रहता है तब तक सान्ख्ययोग का साधन भली प्रकार समझ में नहीं आता | इसी से भगवान् ने साङ्ख्ययोग को कठिन बतलाया है (अ.५ श्लोक ६) तथा (कर्मयोग ) साधन में सुगम होने के कारण अर्जुन के प्रति जगह -जगह  कहा है कि तू निरन्तर मेरा चिन्तन करता हुआ कर्मयोग का आचरण कर |
गीता  - महात्म्य

जो मनुष्य शुद्ध चित्त होकर प्रेम पूर्वक इस पवित्र गीता शास्त्र का पाठ  करता है ,वह भय और शोक आदि से
 रहित होकर विष्णु धाम को प्राप्त कर लेता है ||१||

 जो मनुष्य सदा गीता का पाठ करने वाला है तथा प्राणायाम में तत्पर रहता है उसके इस जन्म और पूर्व जन्म में किये हुए समस्त पाप निः संदेह ही नष्ट हो जाते हैं || २||

जल में प्रतिदिन किया हुआ स्नान मनुष्यों के केवल शारीरिक मल का नाश करता है ,परन्तु गीता ज्ञान रूप जल में एक बार भी किया हुआ स्नान संसार मल को नष्ट करने वाला है ||३||

जो साक्षात् कमलनाभ भगवान् विष्णु के मुखकमल से प्रकट हुई है ,उस गीता का ही भली भांति गान (अर्थ सहित स्वाध्याय ) करना चाहिये , अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या प्रयोजन है ||४||

जो महाभारत का अमृतोपम सार है तथा जो भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से प्रकट हुआ है ,उस गीतारूप गङ्गा जल को पी लेने पर पुनः इस संसार में जन्म नहीं लेना पड.ता ||५||

संपूर्ण उपनिषदें गौ के समान हैं , गोपालनन्दन श्री कृष्ण दुहने वाले हैं ,अर्जुन बछङा  है तथा महान गीतामृत ही उस गौ का दुग्ध है और शुद्ध बुद्धिवाला श्रेष्ठ मनुष्य ही इसका भोक्ता है || ६||  

देवकीनन्दन श्रीकृष्ण का कहा हुआ गीताशास्त्र ही एकमात्र उत्तम शास्त्र है ,भगवान् देवकी नन्दन ही एकमात्र महान् देवता हैं ,उनके नाम ही एकमात्र मन्त्र हैं और उन भगवान् की सेवा ही एकमात्र कर्तव्य कर्म है ||७||

सोमवार, 25 अगस्त 2014

मनु स्मृति में जीव हत्या एवं मांस भक्षण

योऽहिंसकानि भूतानि हिनस्त्यात्मसुखेच्छया |
स जीवंश्च मृतश्चैव न क्वचित्सुखमेधते ||
यो बन्धनवधक्लेशान्प्राणीनां न चिकीर्षति |
स सर्वस्य हितप्रेप्सुः सुखमत्यन्तमश्नुते || (मनुस्मृति ५.२३ )

अर्थात् शास्त्रों में लिखा है कि पशुओं  की या जीवों की हत्या करने वाला
पापी होता है तथा उसे इसका फल अवश्य ही मिलता है |जो व्यक्ति अपने सुख की
इच्छा से अहिंसक जीवों को मारता है ,वह इस जीवन में तथा जन्मान्तर में कहीं
 भी सुख नहीं पाता और जो जीवों को बांधने - मारने या क्लेश देने की इच्छा
नहीं करता वह जीवों का हित चाहने वाला अत्यन्त सुख पाता है | अर्थात जीवों
की हिंसा न करने वाला ,अच्छे फल प्राप्त करता है तथा जीवों की हिंसा केवल
अपने हित के लिये करने वाला व्यक्ति ,सदा ही दुःख भोगता है |
 यद्धयायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च |
तदवाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किंचन ||
नाकृत्वा प्राणीनां हिंसां मांस मुत्पद्यते क्वचित् |
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत् ||( ५.२४)
अर्थात् ऋषि बताते हैं कि मांस खाना कोई अच्छा गुण नहीं  होता ,अतः
ब्राह्मण को मांस नहीं खाना चाहिये |वह ब्राह्मण तो बिल्कुल मांस न खाये
,जो कि वेदों का अध्ययन जानता हो |ऋषि कहते हैं कि किसी जीव को दुःख नहीं
देता ,वह जिस धर्म को भी मन से चाहता है ,जो कर्म करता है ,जिस पदार्थ को
चाहता है वह उसे अनायास ही प्राप्त होता है |जीवों की हिंसा किये बिना मांस
 उत्पन्न नहीं हो सकता |पशुओं का वध करने वाला कभी स्वर्ग को प्राप्त नहीं
करता ,अतः व्यक्ति को मांस खाना ही छोड. देना चाहिये |अर्थात मांस न खाने
वाला व्यक्ति कभी भी पशु की हिंसा नहीं करेगा ,अतः जो व्यक्ति पशुओं को
नुकसान नहीं पहुँचाता ,वह जीवन में सभी सुख भोगता है |
समुत्पत्तिं च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम् |
प्रसमीक्ष्य निवर्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात् |
न भक्षयति यो मांसं विधिं हित्वा पिशाचवत् |
सलोके प्रियतां याति व्याधिभिश्च न पीड्यते || ( ५.२५)              
अर्थात् ऋषि कहते हैं कि मांस न खाने वाला व्यक्ति सदा ही सुख भोगता है अतः
 व्यक्ति को मांस की उत्पत्ति को जानकर तथा जीवों के वध बन्धन को अच्छी तरह
 समझ कर सब प्रकार का मांस - भक्षण त्याग देना चाहिये |जो व्यक्ति पशु
हिंसा को छोड.कर ,पिशाच की तरह मांस नहीं खाता वह बहुत ही मधुर मन का
व्यक्ति होता है तथा संसार में सभी का प्रिय होता है |अच्छे कर्मों के कारण
 ऐसे व्यक्ति को कोई भी रोग नहीं होता |
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी |
संसकर्ता  चोपहर्ता च खादकश्चेतिघातकाः ||
स्वमासं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति |
 अनभ्यर्च्य पितृन्देवांस्ततोऽन्यो  नास्त्यपुण्यकृत || (५.२६)
ऋषि बताते हैं कि किसी भी प्राणी  की हत्या सबसे बड़ा पाप है |जो यह पाप करता है उसे इसका फल अवश्य ही मिलता है |जो व्यक्ति पशु या जीव की हत्या या वध की आज्ञा देता है ,तथा उसका खण्ड खण्ड करने वाला ,उसे मारणे वाला उसे मारकर बेचने वाला ,उसे खरीदने वाला ,उसे पकाने वाला ,उसे परोसने वाला उसे खाने वाला -ये सभी व्यक्ति घातक माने जाते हैं |जो व्यक्ति देवता और पितरों का पूजन किये बिना ही दूसरे जीवों कसा मांस खाते हैं ,तथा स्वयं अपनी सेहत बनाते हैं उससे बढ़ कर पापी दूसरा नहीम् होता है ,अतः पशुओं को मारणे की आज्ञा देने वाले से लेकर उसे पकाकर खाने वाले तक सभी व्यक्ति पापी होते हैं ,वे सभी लोग पशु हिंसा के पाप में शामिल होते हैं |
वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः |
मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् |
फलमूलाशनर्मेध्यैर्मुन्यन्नानां च भोजनैः |
न तत्फलवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ||  ( ५.२७ )
ऋषियों के अनुसार ,वह व्यक्ति जो मांस बिल्कुल भी नहीं खाता और दूसरा वह जो
 प्रत्येक सौ वर्ष तक अश्वमेघ यज्ञ करता है ,यह  दोनों ही बराबर समझे जाते
हैं ,दोनों का ही पुण्यफल बराबर होता है |फल -फूल और मुनियों के हविष्यान्न
 खाने से वह फल प्राप्त नहीं होता है ,जो केवल मांस छोड. देने से होता है
,अतः मांस न खाने वाला व्यक्ति बहुत ही पुण्य प्राप्त करता है |
मांस भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् |
एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः||
न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने |
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ||  ( ५.२८ )
ऋषियों के अनुसार जो व्यक्ति मांस खाता है ,उसे इसका फल अवश्य मिलता है |महान पण्डित कहते हैं कि जो व्यक्ति जिसका मांस खाता है ,वह परलोक में उस व्यक्ति को अवश्य ही खायेगा ,यही मांस का मांसत्व होता है | ऋषि कहते हैं कि मांस खाने ,मद्य पीने ,और स्त्री-प्रसङ्ग करने में दोष नहीं है क्योंकि प्राणियों की प्रवृत्ति ही ऎसी होती है , परन्तु उससे निवृत्त होना महाफलदायी होता है |अतः इनमें कोई पाप नहीं है ,परन्तु नियमों के विरुद्ध जाकर इन्हें करना पाप है |